April 18, 2026

यादों का जंगल

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महावीर सिंह जगवान 

बचपन मे जंगलो से बेइन्तहा मुहब्बत थी, मुझे आज भी याद आठ दस साल की उम्र मे जब भी ननिहाल गवनीगाँव चन्द्रापुरी जाता था तो पहली ख्वाहिश होती थी

ननिहाल के सभी हमउम्र दोस्तों के साथ गाँव के ऊपर सिदार नामक ढलान के शीर्ष पर पहुँचना वहाँ पर बाँज के पेड़ होते थे पहली बार बाँज का पेड़ और लिक्वाल देखे थे, सिदार का ऐसा स्लोप था मानो ओली के हिलटाॅप से जीएमवीएन का गैस्ट हाउस तक, फर्क इतना था वहाँ वर्फ से स्लोप बनता है और यहाँ मिट्टी की मोटी सतह का प्राकृतिक स्लोप, हम रामबाण के पौधे को काटते थे इसके एक छोर पर लकड़ी को फँसाकर इस लकड़ी पर पाँव और रामबाण की गोल तने पर बैठकर गाड़ी चलाते थे सायद यह दो ढाई सौ मीटर का स्लोप रहा होगा, यहाँ पर एक गूलर (खैणा) का पेड़ भी होता था जिसपर बैठकर झूला झूलते थे, इसको चढते दायीं ओर बाँज का घना जंगल और गौशालायें थी। समृद्ध वन और चारापत्ती के साथ छोटे छोटे जलश्रोत और मौसमी गदेरा था। कुछ समय बाद इस स्लोप पर चीड़ का वृक्षारोपण हुआ।

यहाँ से हम डाँडा डोबा (डडोली डोबा) भी जाते थे यहाँ मेरे भाइयों (मामा जी के बालक) का ननिहाल है यानि मेरे दादा दादी जी का गाँव। सुबह उठकर सभी सोये रहते थे और मै दादी जी के साथ गौशाला (मरड़ा) जाते थे दादी दूध दुह कर चाची लोगों के पास घर भैजती थी और भैसों के साथ हम जंगल चले जाते थे, जंगल बहुत घना और समृद्ध था लताऔं पर झूलता रहता था, दिनभर जंगल मे रहना, प्यास लगे तो दादी प्याज का टुकड़ा देती थी इससे प्यास बुझ जाती थी, जानवरों के लिये जंगल मे प्राकृतिक रूप से छोटे छोटे कीचड़ से सनै तालाब थे, जंगल मे कई भैंसे चरती थी अधिशंख्य के साथ स्वामी होते थे। यहाँ पहली बार मैने वृद्धों को बाँज के पत्ते से कुप्पी नुमा आकार बनाकर उसमे तंबाकू और जंगली कपास पर लोहे के एक छोटे टुकड़े (अग्यलू) पर कड़क पत्थर (फटींग) पर रगड़कर आग पैदा कर तंबाकू पीते देखा। आपस मे इतना मृदु ब्यवहार मानो स्वर्ग मे देवता संवाद कर रहे हों, वापसी मे सभी पशु स्वामी अपने जानवरों को वापस गौशाला लाते और कुछ लोग टाॅर्च के जंगल की ओर बढते पूछते आप लोंगो ने हमारे जानवर देखे और दादी वृद्ध कहते हाँ आपके भैंस की घंटी तो सुनी थी उस जगह पर (फलाणी जगा पर) और आइडिया लेकर वो अपने जानवरों की ढूँढ करते यह कभी कभी होता है जब देर तक जानवर घर नहीं आया तो ढूँढ करते हैं, इसमे सबसे बड़ी बात है इनके गले मे शुद्ध काँसे की घण्टी बंधी रहती है और पशु के हिलने डुलने पर घण्टी बजती रहती है, और मालिक को आवाज के आधार पर पशु तक पहुँचने मे सुविधा होती है, इन समृद्ध वनो की स्मृति आज भी मेरे मन मस्तिष्क मे है।

यहाँ से हम निकलते थे बूबा (मामा जी के मामा) जी के गाँव जहँगी, मेरे बूबा लोग तीन भाई थे, दो सेना मे और एक घर में, घर वाले बूबा जी बहुत मेहनती कर्मयोगी थे इन्होने जंगल से घिरी एक जगह पर अत्यअथिक मेहनत कर घर खेत खलिहान विकसित किया। इनके घर मे तीन चार हौ लीटर की एक पानी की टंकी थी जिसे हाथ से पत्थर को गोदकर बनाया था। घर के लिये मसाले सब्जी अन्न और फल फ्रूट की सम्मपन्नता थी भले ही करेन्सी का अभाव था, पहली बार खुमानी और मुसम्मी यहीं देखी, मुसम्मी की ऐसी प्रजाति अभी तक नहीं देख सका। चारों ओर बाँज का घना जंगल शीर्ष पर जग प्रसिद्ध कार्तिकेय भगवान का मंदिर। आज भी अहसास करने पर अंतस को सुकून मिलता है, उसनतोली नामक जगह यह बुग्याल वाकई रमणीक और जैवविवधता से सम्मपन्न है ऐसे पर्यावरणीय दृष्टि से समृद्ध वन सदैव स्मृति मे हिलोरे मारते हैं।

अपनी बुवा के गाँव जखोली जाकर उनकी गौशालाऔं को देखकर मन अभिभूत हो जाता था, आदमकद की घास से बनी गौशाला की छत ऐसी लगती थी मानो दुल्हन ने चुनरी ओढी हो, अखरोट के पेड़, माटी और वनस्पतियों से लकदक खेत जंगल बहता निर्झर जल मृदु संवाद कर यहीं रमने को उकसाती कुदरत की यह सब रचनायें दुर्लभ थी। अपने सखा के संग बणसू गया आनंदित हर्षित हो गया गल्याकट्यों बाँज का जंगल देखकर जो बरसूड़ी के ऊपर है। लोगो के न जाने किस चीज की ख्वाइश रही हो, बस सखा से कहा ऊपर चोटी तक ले जा, मोलखाखाल होते भैंसवाड़ा और वहाँ से चुपिड्यों पाणी गये यहाँ बर्फ गिरती थी, वन्य जीव से सम्मपन्न यह वन सदा आमन्त्रित करते हैं लेकिन समय की वंदिस बचपन के हर लम्हें को छूने की आजादी तो नहीं देते लेकिन जिद्द हो तो संभव है पुनर्मिलन। वनों की सम्मपन्नता के पीछे पीढियों से वृक्ष और वनो के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना रही है हिमालय की घाटियों और चोटियों मे बसे लोंगो की। यहाँ वन देवता हैं वृक्ष देवता हैं, चारा पत्ती के लिये जंगल जाने तक का नियम और सयंम है।

मैदान के लोग जंगल काटते गये और जंगलों को कृषि भूमि मे बदलकर जंगल के जंगल निगल गये जबकि पहाड़वासियों ने सदैव जंगलों को पुत्रवत पाला है सहेजा है और विकसित किया है। संरक्षण की सर्वोच्चता को बनाकर दोहन रचनात्मक रूप मे ही किया है। जंगलों मे जंगली जानवर के मानवीय और कृषि नुकसान के वावजूद जंगलों और जंगलीं जानवरों का सम्मान किया है। बदले मे भले ही पहाड़वासियों को पीड़ा ही क्यो न सहनी पड़े। बंदोबस्त मे जितनी भूमि यहाँ का निवासी जुताई कर पाया वह उसकी हुई और वाकी सारी वन भूमि हो गई, आज भी एक चौथाई पहाड़ वासी भूमिहीन है, दो चौथाई के पास पाँच से बीस नाली और बचे एक चौथाई के पास ही बीस नाली से सौ डेढ सौ नाली तक कृषि जमीन। कुल कृषि भूमि का एक चौथाई ही सिंचित है वाकी सब ऊसर भूमि। उत्तराखण्ड के तीन चौथाई पर्वतीय भूभाग मे जंगलों की सेहत सहेजने मे वन महकमा लाचार है और अब ग्रामीण वनों की संरक्षण की भावना छोड़कर सबकुछ सरकारों के भरोसे छोड़ रहे हैं, सरकारे कागजों मे चिल्ला चिल्ला कर वनो को समृद्ध बना रही है जबकि धरातल पर वन और वनो की सम्मपन्न जैव विवधता का ह्रास हो रहा है।

पिछले कुछ दशकों जनवरी के मध्य से जंगलों मे आग लगने की शुरूआत हो रही है और जुलाई के महीने तक वनाग्नि तबाही मचा दे रही है। हर साल तीन लाख हैक्टेयर से भी अधिक वन वनाग्नि की चपेट मे आकर धू धू कर जल रहे हैं। जैवविवधता को भारी क्षति पहुँच रही है, जंगली पशु पच्छियों मधुमक्खियों कीट पतंगो के साथ विशिल काय से लेकर छोटे छोटे जंगली जानवरों का विनाश हो रहा है, बेशकीमती जड़ीबूटियों से लेकर वयस्क पेड़ अकाल मौत मर रहे हैं, प्राकृतिक रूप से पत्तों टहनियों से बनती खाद नष्ट हो रही है, मिट्टी की ऊपरी सतह की उत्पादकता समाप्त हो रही है, निरन्तर वनाग्नि का दायरा बढ रहा है और अब तो उच्च हिमालय के चौड़ी पत्ती वाले वन और बुग्यालों तक संकट फैला है परिणति तापमान बढ रहा है और ग्लैशियरों तक इसका सीधा प्रभाव है। वायुमण्डल मे कार्वनडाईऑक्साइड बढ रही है। बाहर से समृद्ध दिखते वन अंदर से खोखले हो रहे हैं जो भविष्य के समृद्ध हिमालय को चुनौती है।

आखिर आखर पढलिखकर, मोटा रूपया पानी की तरह बढाकर, दिखावट और वनावट के विज्ञान के वावजूद हम वनाग्नि जैसे राक्षस पर काबू नहीं कर पा रहे हैं और यह निरन्तर वनो को निगलता जा रहा है, क्या मूकदर्शक बनकर इन समृध वनो को भगवान भरोसे छोड़ा जा सकता है, भूस्खलन मे चालीस फीसदी वनाग्नि का प्रभाव है। यदि वन नहीं होंगे तो वसन्त कैसे रूबरू होगा, वनस्पतियाँ विलुप्त हो जायेंगी, वन्य जीव जन्तु मिट जायेंगे और जल संकट से बढता यह संकट मानवीय जीवन की देहली तक पहुँच जायेगा। वन वनाग्नि से बच सकते हैं बशर्ते सरकार वनो के प्रबन्धन मे स्थानीय निवासियों की भूमिका बढाये, वनो को साठ फीसदी प्रकृति रूप मे विकसित होनें दें, बीस फीसदी मानवीय हस्तक्षेप से उत्पादक बनाये जा सकते हैं। यहाँ रोजगार भी होगा, जल संरक्षण के उपाय भी होंगे, जमीन के अंपर और नीचे उगाई जाने वाली वनोषधि चाय और जंगली फलों के बाग विकसित किये जा सकते हैं यह वन वनाग्नि से मुक्त होकर समृद्धि की ओर बढेंगे, इनसे आजीविका, पर्यटन और समृद्धि को बटोरा जा सकता है।
आयें मिलकर उन सुझावों को साझा करें जिनसे वन वनाग्नि से मुक्त होकर समृद्धि और रोजगार के अवसर प्रदान करें, वनो की समृद्धि से हिमालय के ग्लेशियर, वर्षा, आवोहवा, गुणवत्ता युक्त मिट्टी, सम्मपन्न जैवविवधता, वन्य संपदा, रोजगार के अवसर का विकास और संरक्षण होगा। समृद्ध वन समृद्ध हिमालय से ही हिमालय के वासी समृद्ध होंगे।