सेना में ब्राह्मणों का प्रवेश

डॉ. योगेश धस्माना
सेना में ब्राह्मणों को प्रवेश दिलाने वाले तोताराम थपलियाल. गढ़वाल,कुमाऊं ओर गोरखा रेजीमेन्ट में शुरू में केवल क्षत्रिय जाति के लोगों को ही भर्ती किया जाता था। प्रथम विश्व युद्ध में सैनिकों की आवश्यकता को देखते हुए अंग्रेज अधिकारियों ने अपने विश्वास पात्र गढ़वालियों, जिसमें चक्रधर जुयाल और ब्रिटिश गढ़वाल के पहले डिप्टी कलेक्टर गोविंद प्रसाद घिल्डियाल को फौज में, गढ़वाली युवकों की भर्ती के लिए विशेष अभियान चलाने की जिम्मेदारी सौंपी थी। इस कारण कई युवक ब्राह्मण और शिल्पकार भी जाति बदल कर सेना में भर्ती हुए। गढ़वाल में ब्रिटिश शासन के 100 वर्ष पूर्ण होने ओर प्रथम विश्व युद्ध में गढ़वाली सैनिकों के शानदार प्रदर्शन के बाद, उनके सम्मान में 1919 को श्रीनगर गढ़वाल में आयोजित समारोह में, तोताराम थपलियाल ने पहली बार अंग्रेजों के सामने गढ़वाली सैनिकों के शौर्य नृत्य प्रस्तुत करते हुए कहा था कि, आप निर्णय लें कि इन सेनिको में कौन राजपूत ओर कौन ब्राह्मण है। ब्रिटिश अधिकारी दंग रह गए, तब तोताराम ने उनसे कहा कि जब सैनिक युवकों में भेद नहीं कर पा रहे हैं, तो ब्रिटिश सेना में अन्य लोगों को भर्ती होने के अवसर क्यों नहीं दिए जा रहे हैं। इसके बाद ही गढ़वाल, कुमाऊं ओर गोरखा रेजीमेंट में सभी जातियों के लिए भर्ती के द्वार खोल दिए गए। इसका संपूर्ण विवरण गढ़वाली साप्ताहिक अखबार के माह मई के 1919 के अंकों में भी तोताराम थपलियाल का आलेख प्रकाशित हुआ था।
लेखक देवेश जोशी की हाल में प्रकाशित पुस्तक गढ़वाल और प्रथम विश्व युद्ध में उन्होंने लिखा है कि, तोताराम को स्वयं अंग्रेजों ने सेना में सीधे सूबेदार पद पर नियुक्त किया था। इतना ही नहीं इन्हें सोर्ड ऑफ़ ऑनर और रोब ऑफ ऑनर से भी सम्मानित किया गया था। हिंदी, अंग्रेजी, अरबी, फारसी और तिब्बती भाषा के जानकार तोता राम का जन्म 1880 में, पौड़ी गढ़वाल के गांव गंगोली सेन पट्टी खात्सियों में पिता काशीराम के घर पर हुआ था, जो एक कर्मकांडी पंडित थे। लेखक देवेश जोशी के अनुसार तोताराम ने 1890 के ई. के. पौ. भूमि बंदोबस्त में काम कर अंग्रेज अधिकारियों का भी दिल जीता था। कुछ अरसे तक उन्होंने पौड़ी – टिहरी में शिक्षण कार्य भी किया। देवेश के अनुसार उन्होंने हिमाचल प्रदेश के राणा राज परिवार में, उनके निजी शिक्षक के रूप में भी काम किया था। तोताराम गढ़वाल जिला बोर्ड के सदस्य और उपाध्यक्ष भी रहे थे। 1970 में अपने गांव में ही उनका निधन हुआ।

तोताराम थपलियाल की कुशाग्र बुद्धि और ज्ञान के कारण अंग्रेज सैन्य अधिकारी उनके मुरीद थे। इनके परामर्श पर ही उन्होंने पंजाब रेजिमेंट में ब्राह्मण यूनिट का गठन किया था। राजस्व विभाग से हटकर उन्होंने लोक निर्माण विभाग में भी ठेकेदार पद पर सेना से अवकाश ग्रहण के बाद काम किया। देवेश जोशी के अनुसार उन्होंने शिमला डिविजन में हिंदुस्तान – तिब्बत सड़क निर्माण में उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी। इस कार्य के लिए उनको 1904 में तिब्बत, 1904 का सिविल सर्विस मैडल भी प्राप्त किया था। गढ़वाल के डिप्टी कमिश्नर और केंद्र में सैन्य प्रकोष्ठ किया अधिकारी, जे. सी. सी. क्ले. ने तोताराम के कार्यों की प्रशंसा करते हुए लिखा था, अ रीमार्केबल सूबेदार आई हैव नाट द लीस्ट डाउट डेंट ही वुड डू हिज बेस्ट टू कैरी आउट द ड्यूटीज दैट माइट बी एंट्रस्टेड टू हिम।
तोताराम के पुत्र परशुराम थपलियाल रेलवे पुलिस में रह कर राष्ट्रीय स्तर पर हाकी खेल चुके है। हाकी के जादूगर ध्यानचंद उनके गहरे मित्र थे, उन्हें लेकर एक बार वे पौड़ी भी आए थे। परशुराम बताते थे कि तब पौड़ी में हाकी खेलने का चलन नहीं था। पर ध्यानचंद को पौड़ी कंडोलिया बहुत पसंद आया था। तोताराम की पुत्री विद्यावती उनियाल गढ़वाल विश्वविद्यालय आंदोलन में अग्रणीय भूमिका में रही थी। उनके नाती डॉ राजेश्वर उनियाल बंबई में है, जबकि छोटे नाती वेद विलास प्रसिद्ध पत्रकार और नोएडा में टीवी चैनल में काम करते है। इनके पिता भगवती प्रसाद थपलियाल पौड़ी मिशन स्कूल में एक आदर्श शिक्षक के रूप में प्रसिद्धि रहे हैं तोताराम जी को हमारा शत शत नमन. तोताराम थपलियाल ओर उनको मिले ब्रिटिश सेना के सम्मान पत्र को पाठकों के लिए साझा कर रहा हूं।
लेखक लोक इतिहासकार हैं.