तुमने कितनी धूल फांकी है ?
जयप्रकाश पंवार ‘जेपी’
कुछ दिन पहले उत्तरकाशी के भटवाड़ी व टकनौर के इलाके के गांवों में था. रैथल – बारसू की ओर टेम्पो ट्रैवलर दौड़े चले जा रहे थे, सर्दियों की दयारा बुग्याल की ट्रैकिंग धीरे – धीरे परवान चढ़ रही है. भले ही गंगोत्री के पट बंद हो चुके हैं, लेकिन घुमक्कड़ों का क्या ? जहाँ तक जाया जा सके जा रहे हैं. धराली वीरान पड़ा है. सामने मुखबा के गांव के लोगो ने पंचायत चुनाव का बहिष्कार किया हुआ है. उनकी मांग मुखबा से जांगला तक मोटर मार्ग निर्माण की है, वहीँ पर्यावरणीय कार्यकर्त्ता एक प्राचीन जंगल व उसके पेड़ों को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. वहीँ दूसरी ओर वन विभाग ने पेड़ों की कटाई के लिए पेड़ों पर संख्या व चिन्ह लगा दिए हैं. जब बात यहाँ तक पहुँच गयी है तो समझो पेड़ों की बलि निश्चित है. मुखबा के लोगों का पर्यावरण कार्यकर्ताओं के साथ आमना – सामना हो रहा है. दोनों के अपने तर्क – वितर्क हैं.
मुखबा से जांगला की सुन्दर पैदल बटिया पर जब माँ गंगा की डोली यात्रा गुजरती है, तो वह एक अविस्मर्णीय पल होता है. शानदार घने व कई साल पुराने पेड़ों की छाँव, इस यात्रा को प्रकृतिजन्य बनाती है. यहाँ सड़क बनाने की मांग से इस इलाके की प्राकृतिक सुन्दरता समाप्त हो जायेगी. माँ गंगा की डोली को जब भक्तगण अपने कंधे पर ले जाते हैं, तो उसका आध्यात्मिक व ऐतिहासिक पक्ष नजर आता है. माँ अपने मायके, अपने गांव को निहारते, अपने जंगल, पानी, खेतों, अपने परिवारजनों से मिलते – जुलते गंगोत्री पहुंचती रही है, इससे माँ का मन तृप्त हो जाता है. इस भावनात्मक पक्ष को नकारना ठीक नहीं. गाड़ी पर ढोकर माँ गंगा की डोली ले जाना, ऐसा ही लगता है कि ऋषिकेश से कोई आलू की बोरी को गंगोत्री पहुंचाना. माँ गंगा की पैदल यात्रा, केदारनाथ की डोली यात्रा की तरह एक ऐतिहासिक क्षण है, इस परंपरा को पिछले साल तोड़ा गया है. इस पर जरुर विचार किया जाना चाहिये. बाकी सड़क बनाना न बनाना वक़्त की बात है.
उधर बगल में बगोरी गांव के लोग अपने शीतकालीन गांव डुंडा पहुँच चुके है. सुक्की, झाला, जसपुर, हरसिल, पोंगी गांव भी ठहर से गए हैं, लोग बर्फवारी का इन्तजार कर रहे हैं व अपने सेब के बगीचों की सेवा में लगे हैं. वापस भटवाड़ी में रात्रि विश्राम था, कि तभी वन विभाग की गाड़ी में लगे माइक पर घोषणा होने लगी, पता चला कि, इस इलाके मैं भालुओं का दल घूम रहा है. ग्रामीणों को चेतावनी दी जा रही है. इस साल बाघ, भालुओं ने राज्य में भीषण आतंक मचाया हुआ है, यह उसकी एक बानगी है. मैं जब भी इस घाटी में आता हूँ, तो पाला मनेरी बांध के ठप्प पड़े होने से एक टीस सी उठती है. 600 मेगावाट विद्युत उत्पादन का नुकसान हमारा देश व प्रदेश व यहाँ की जनता उठा रही है. ज्ञात रहे, इस परियोजना का लगभग 70 फ़ीसदी मुख्य कार्य पूरे हो चुके थे. सुरंगे खुद चुकी थी. भूमिगत विद्युत गृह का कार्य भी पूरा हो चुका था. जो तथाकथित नुकशान हो चुका था, हो चुका था, इस परियोजना से कोई विस्थापन जैसी कोई समस्या नहीं थी. सिर्फ कुछ पर्यावरण कार्यकर्ताओं की जिद ने लगभग पूर्ण हो चुकी परियोजना का बंटाधार कर दिया, वैसे ही यह निर्णय लेने वाले संस्थान हैं जो प्रायोगिक निर्णय लेने में असफल रहे, अपुष्ट सूचना है कि अब करोड़ों रुपये का बजट इसको बंद करने में खर्च किया जाने वाला है. इसी घाटी में पहली जल विद्युत परियोजना मनेरी बांध परियोजना है. जो 1984 में बनी थी, जो 90 मेगावाट का आज भी उत्पादन कर रही है. स्थानीय ग्रामीण बता रहे थे कि इस परियोजना का उदघाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गाँधी ने किया था व जिस दिन उदघाटन किया, उस दिन तक मनेरी बांध परियोजना ने अपने निर्माण में हुए खर्च को वसूल कर दिया था. तब से अब तक परियोजना ने देश व प्रदेश की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जो आज भी बदस्तूर जारी है.
थोड़ा हटकर, भटवाड़ी की बाड़ागड्डी पट्टी में लगभग दो दर्जन गांव हैं. इसका मुख्य केंद्र मुस्टिकसौड़ है, जो बहुत सुन्दर स्थान है. इसकी सबसे ऊँची चोटी पर हरि महाराज विराजते हैं. जिनका हर साल 22 सितम्बर को विशाल कार्यक्रम आयोजित किया जाता है. उल्लेखनीय है कि हरी महाराज की कोई डोली नहीं है, न ही कोई विशाल मंदिर, वह ऊँची चोटी में एक साधारण से मंदिर में विराजित हैं. इस जंगल में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है. बाड़ागड्डी पट्टी के गांवों के अराध्य हरि महाराज को ढोल के रूप में पूजा जाता है. दरअसल, शिव के पुत्र के रूप में जाने जाने वाले कार्तिकेय ही हरि महाराज हैं. कार्तिकेय का उत्तराखंड में सबसे प्रसिद्ध स्थान चमोली जनपद के कार्तिक स्वामी – कनकचौरी में स्थित है, जहाँ स्त्री – पुरुष दोनों का प्रवेश हो सकता है, लेकिन बाड़ागड्डी पट्टी में हरि महाराज की चोटी में महिलाएं नहीं जा सकती यह शोध का विषय है. उत्तराखंड या अन्य जगह कार्तिकेय नाम से परिचित शिव पुत्र दक्षिण भारत में मुरुगन स्वामी के नाम से प्रसिद्ध हैं. कार्तिक स्वामी मंदिर के सौन्दरीकरण व प्रचार – प्रसार ने इस चोटी पर स्थित मंदिर, जहाँ से हिमालय की दिब्य भव्य बर्फीली चोटियों के दर्शन होते हैं, को एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर दिया है. और, धीरे –धीरे यहाँ की यात्रा हेतु दक्षिण भारत के लोग पहुँचने लगे हैं. उत्तराखंड सरकार में दक्षिण भारत के उच्च पदस्थ लोग व वहां के निवासियों का यहाँ आना – जाना इस स्थल को भविष्य का बड़ा टूरिस्ट डेस्टिनेशन बनायेगा. जो स्थानीय लोगो का प्रमुख रोजगार का केंद्र भी बनेगा. यह गुजरा साल जहाँ, प्राकृतिक आपदाओं की यादों, घटनाओं की टीस दिलाता रहेगा, वहीँ उत्तराखंड राज्य स्थापना के पच्चीस सालों की रजत जयंती वर्ष के लिए भी याद किया जाता रहेगा, इसी गंगा घाटी में उपजी कुछ पंक्तियाँ आपके लिए….
“तुमने कितनी धूल फांकी है,
वो तेरा चस्माँ बता देता है.”
