तुम आ जाओ, ताप जाओ यहां घाम

वीरेन्द्र कुमार पैन्यूली
तुम आ जाओ ताप जाओ यहां घाम ।
क्योंकि शिखरों से शिखर पुरूष का यह पैगाम ।
इन हिमाच्छादित शिखरों से उखड़ते उफनते बर्फ के बौछारों से तुम्हे क्या ।
ये धुंधला भी जायें तो तुम्हे क्या ।
तुम तो आओ ताप जाओ घाम ।
कर लो हमारी गुनगुनी घाम अपने नाम ।
दौड़ाओं सैकड़ों बाइक इसकी तुम्हे छूट दी जायेगी ।
यह पैगाम भी घाम तापने वाले दिन ही आया था ।
तेज गति से छितरा देना धुंआ धुंआ
धीरे धीरे हमारे लिये खुदने लगेगा मौत का कुंआ ।
एक और गुरूमंत्र न भूल जाना पोर्टलों पर इनफ्ल्यून्सर बन भी कमाना ।
प्रेरित करो हजारे टूरिस्टों को वाहनों को।
पैदा करो बर्फ लदे पहाड़ों में भी वही कार्बनी धुंध जिससे भाग तुम यहां आना चाहते हो । दिल्ली में उसे स्मौग कहते हो ।
इस पर भी तुम्हे कोई कुछ नहीं कहेगा ।
क्योंकि शीत कालिन तीर्थाटन उसके अनुशासन पर तो बात कम हुई ।
यह विषय तो रह गया । केदार रह गया माणा रह गया ।
हर्षिल में फिर विल्सन आसमान में मंडरा गया ।
एक राजा का जंगल का खरीददार फिर जाग गया ।
सरकारी आमंत्रण है ।
ऐसे में दिल्ली जैसे स्मौग की सौगात गौमुख तक भी पहुंच जाये तो क्या । सिलक्यारा की किसको याद है । वरूणावर्त से कौन घबराया है ।
किन्तु आखिर प्रकृति कब तक सहेगी ।
वह तुमसे लड़गी तो नहीं – पर पहाड़ों में बर्फ नहीं थमेगी ।
आसमान में व तृणपातों में कालिमा उलझेगी ।
तब कोई शायद ही कहे चलो पहाड़ों में घाम ताप आये ।
वहां से साफ हवा फेफड़ों में भर लायें ।
वहां जा आंखों से भी घाम स्पर्श कर लें ।
पर इस सबके बावजूद
यदि सारी चेतावनियों को दंभ में ठेंगा दिखाने ।
लक दक हो तुम आ ही गये तो
हमारी जमीन के खरीददार न बनना ।
अपनी सौगात से सोहबत से यहां धाम कई मवासियों पर घाम न लगा देना ।
घाम तुम ताप लेना पर बर्फ में ताप मत पैदा करना ।
बुग्याली शादी का चसका तुम्हें लग चुका है ।
गुप्ता बंधुंओं की सैकड़ों टन गंदगी का धसका हमें लग चुका है ।
विरोध करने वाले चंद हैं ।
ज्यादा गुरूज्ञान ग्राहित अनुशासित अकलमंद हैं ।