क्यों करते नखरे, बादल जहरीखाल के

डॉ. अरुण कुकसाल
13 अगस्त, 2022, पहाड़ की ऊपरी नोक के दोनों ओर की ढ़लानों पर दूर तक जयहरीखाल (समुद्रतल से ऊंचाई 1660 मीटर) पसरा हुआ है। इससे पहले सन् 1986 में अपने साथियों (प्रदीप टम्टा, दीवान नगरकोटी, मंगल सिंह और चन्द्रशेखर तिवारी) के साथ जयहरीखाल आना हुआ था। ऐसा लग रहा है जैसा तीन दशक पहले छोड़ गया था वैसा ही है जयहरीखाल। बस, नये भवनों की चमक के बीच पुराने भवन मुटा से गये हैं।
जयहरीखाल मेन बाजार में स्थित ‘वैली व्यू, होम स्टे’ में रहने का इंतजाम है। इसे राजीव-पूजा धस्मानाजी संचालित करते हैं। राजीव धस्माना के पिताजी स्वः जगदम्बा प्रसाद धस्माना जयहरीखाल के प्रथम ब्लाक प्रमुख (सन् 1962-74) रहे। राजीव ने जानकारी दी कि पुराने सरकारी और गैर-सरकारी अभिलेखों में जयहरीखाल का नाम जहरीखाल अथवा जैहरीखाल दर्ज है। बदलते समय में नया नाम जयहरीखाल प्रचलन में आया।

राजीव बताते हैं कि देश की स्वाधीनता आन्दोलन में जयहरीखाल का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी वीर जयानन्द भारतीय ने 28 अगस्त, 1930 को राजकीय विद्यालय, जयहरीखाल में तिरंगा झंडा फहराकर आज़ादी के लिए विद्यार्थियों को प्रेरित किया था। जयानन्द भारतीय को इसके लिए तीन माह की सजा भी हुई थी। जयहरीखाल अग्रेंजों के जमाने से ही शिक्षा का प्रमुख केन्द्र रहा है। स्वतत्रंता के बाद भी उप्र के सर्वोत्तम विद्यालयों में जयहरीखाल शामिल रहता था। राजीव चिन्तित हैं कि उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद उस सम्मान को बनाये रखना तो दूर यहां की शिक्षा का स्तर अद्योपतन की ओर हैं।
पंचायत घर, जयहरीखाल की दीवार पर बाबा नागार्जुन (वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’) की कविता सुंदर अक्षरों में चमचमा रही है। बाबा नागार्जुन ने ये कविता अपने जयहरीखाल प्रवास के दौरान लिखी थी-
‘उमड़-घुमड़ कर नभ में छाए, बादल जहरीखाल के
हमको तो ये बेहद भाये, बादल जहरीखाल के
क्यों करते है इतने नखरे, बादल जहरीखाल के
क्यों लगते है बिखरे-बिखरे, बादल जहरीखाल के
सचमुच हमें निहाल करेंगें, बादल जहरीखाल के
हरे-भरे होगें ग्रामांचल, अब पौड़ी गढ़वाल के’
(बाबा नागार्जुन का जयहरीखाल से विशेष लगाव था। सन् 1981-88 तक जयहरीखाल में एडवोकेट ललिता प्रसाद सुन्द्रियाल के घर में किराये पर रह रहे हिन्दी के प्रोफेसर वाचस्पति शर्मा के पास बतौर मेहमान उनका आना-जाना रहा। घर के नजदीक नाशपाती के पेड़ के नीचे या पंचायत घर में उनकी काव्य संध्या सजती थी। छड़ी की ठक-ठक करते झुके कंधे वाले बाबा नागार्जुन जयहरीखाल में सबके प्रिय थे। मुझे याद आया कि हम मित्रों ने 22 जून, 1986 को बाबा नागार्जुन का 75वां जन्मदिन जयहरीखाल में मनाया गया था।)
अस्सी के दशक में लिखी इस कविता के माध्यम से बाबा पौड़ी गढ़वाल के ग्रामांचलों को भविष्य में हरा-भरा देखने की उम्मीद पाले हुये थे। परन्तु, आज तक जयहरीखाल के पहाड़ी गांवों में सृमद्धि का हरा पन तो आया नहीं पर जरा सी मौसम की नज़ाकत पर उमड़ते-घुमड़ते बादलों के नखरों का जलवा यहां अभी भी जारी है।
जयहरीखाल की सबसे ऊपरी चोटी पर लैन्सडौन (समुद्रतल से उंचाई 1800 मीटर) है। इन दोनों की सड़क से दूरी 5 किमी. है। लैन्सडौन से वृहद हिमालय और गंगा नदी का खूबसूरत नज़ारा दिखाई देता है। वृहद हिमालय और गंगा नदी को एक साथ देखने का विरल संयोग लैन्सडौन से ही संभव है।
लैन्सडौन नगर बिट्रिश सत्ता द्वारा सैनिक छावनी के रूप में बसाया गया। तब उस काल में अंग्रेजों के साथ सैनिक ही नहीं वरन देश के अनेक भागों के विभिन्न व्यवसायी और कामगार भी यहां आकर उस दौर में बसना शुरू हुए। इसीलिए, लैन्सडौन सैनिक नगरी ही नहीं एक जीवंत सांस्कृतिक शहर भी है। यहां की रामलीला बहुत प्रसिद्ध है। जिसे देखने दूर-दूर से लोग आते हैं।

अंग्रेज मूलतः पहाड़ी इलाकों के वाशिंदे थे। इस कारण गढ़वाल-कुमायूं के पहाड़ों से उनका आत्मीय लगाव होना स्वाभाविक था। पहाड़ियों का संघर्षमयी जीवन, उत्तम स्वास्थ्य और ईमानदारी का फायदा वे उन्हें सेना में भर्ती करके लेना चाहते थे। इसी उद्देश्य से लैन्सडौन में गढ़वाल राइफल्स का रेजीमेंटल सैण्टर की स्थापना सन् 1887 में हुई थी। इससे पूर्व इस पहाड़ी को ‘काळों का डांडा’ कहा जाता था। हर समय कोहरे से ढ़के रहने के कारण इस पूरे क्षेत्र में कालिमा छाई रहती थी। इसीलिए इसे ‘काळों का डांडा’ कहा जाता था। इस बारे में एक ओर कहानी प्रचलन में है कि इस डांडे में कालू सैयद फकीर रहते थे। कालू फकीर स्थानीय लोगों में बहुत सम्मानित थे, उन्हीं के नाम पर इसे ‘काळों का डांडा’ कहा जाता था।
कोटद्वार से 42 किमी़ की दूरी पर स्थित लैन्सडौन में ‘गढ़वाल राइफल’ के गठन के मुख्य सूत्रधार लाट सुबेदार बलभद्र सिंह नेगी (सन् 1829 – 1896) को माना जाता है। इससे पूर्व गढ़वाल के युवा गोरखा राइफल में ही भर्ती हो पाते थे। कमान्डर इन चीफ, पी. रोबर्टस ने सन् 1884 में तत्कालीन गर्वनर जनरल लार्ड डफरिन को गढ़वालियों की एक स्वतंत्र बटालियन के गठन के प्रस्ताव की भूमिका में ये महत्वपूर्ण तथ्य लिखा था ‘जिस अंचल में बलभद्र सिंह जैसे वीरों का जन्म होता है, उसकी अपनी अलग रेजीमेंट होनी ही चाहिए।’
परिणामस्वरूप तत्कालीन बिट्रिश सरकार ने सन् 1887 में अल्मोड़ा में तैनात गोरखा राइफल में भर्ती गढ़वाली एवं अन्य सैनिकों को मिलाकर ‘गढ़वाल राइफल’ का गठन करके उसका मुख्यालय ‘काळों का डांडा’ में स्थापित किया था। ‘काळों का डांडा’ नजदीकी गांवों का खरक/पशुचारण क्षेत्र था। उसे अग्रेंजों द्वारा सैनिक छावनी के लिए खरीदा गया। बाद में, सन् 1890 में सैनिक छावनी ‘काळों का डांडा’ का नाम बदल कर तत्कालीन वाइसराय लार्ड लैन्सडौन के नाम पर लैन्सडौन कर दिया गया।
जयहरीखाल से लैंसडोन का रास्ते पर चलते हुए लग रहा है जैसे रानीखेत से चौबटिया की ओर जा रहे हों। प्राकृतिक समानता के साथ सैनिक छावनी होने के कारण दोनों का एक दूसरे के जैसे होना स्वाभाविक है। आजकल छुट्टियों का दौर है इसलिए पर्यटकों से झुण्ड हर ओर नज़र आ रहे हैं। ‘टिप इन टॉप पॉइंट’ पर भीड़ इतनी है कि लोग सैल्फी अपनी खींच रहे हैं पर तब तक मोबाइल पर कोई अजनबी आ-जा रहा है। सबकी कोशिश है कि सामने हिमालय और उसकी तलहटी में बसे गांव उनके मोबाइल की रेंज में आ जाय। पर कमब्ख्त कोहरा विलेन बनकर हिमालय और उसकी पहाड़ियों को अपने आगोश में लेकर यहां-वहां टहल रहा है। वैसे, मौसम के साफ होने पर यहां से सूर्योदय और सूर्यास्त का अदभुत दृश्य दिखाई देता है।
‘पहाड़ी गांव बहुत सुंदर दिख रहे हैं’ ‘जाते कैसे होते होंगे वहां?’ ‘वाकई रहना बड़ा मुश्किल हैं, पहाड़ों पर’, ‘ये ताजी हवा, दिल्ली में कहां?’ ‘ले जाने की सुविधा होती तो मैं भर-भर के ले जाती’ ‘इस गाने के साथ मेरा भी वीडियो बना दो’ ऐसी बातें हमारे आस-पास टकराने वाले पर्यटकों की सुनाई दे रही हैं। परन्तु, हमारे साथ के तथाकथित पर्यटकों की निगाह सामने बन रहे गरमा-गरम पकौंडों पर ही टिकी है। अब पहाड़ियों को पहाड़ क्या लुभायेंगे? उनके लिए ये सब अपने घर के आंगन से रोज देखना जैसा हुआ। पहाड़ उनके लिए सब एक जैसे हुए, उसमें रोमांच कैसा?
लैंसडोन साफ-सुथरा और व्यवस्थित नगर है। हर चीज जो जहां होनी चाहिए, वहीं है। पेड-पौंधों को भी जैसे ठम्म ‘सीधे खड़े रहो’ रहने का आदेश हो। सड़कों में जगह-जगह पर सजाये गए युद्ध स्मारक अतीत की कठिन बातें कहते हुए नज़र आते हैं। लैन्सडौन से अनेक स्थानों के लिए ट्रैंकिग रूट दिनों-दिन बेहद लोकप्रिय हो रहे हैं। नगर के मुख्य चौक की दीवार पर झोड़ा नृत्य करते एक-दूसरे की कमर हाथ से पकड़े स्त्री-पुरुषों का एक सजीव चित्र है। हिमाली कहती है ‘इस चित्र में पुरुषों के पैंरों में जूते और महिलायें नंगे पैर हैं।’ ये तो सरासर नाइन्साफी है। जेण्डर वायसनस की मानसिकता कलाकारी में भी है।’ ‘महिलायें नृत्य कर रही हैं, इसलिए’ एक अजनबी व्यक्ति यह सुनकर प्रत्युत्तर देता है। ‘गौर से देखो अकंल, महिला-पुरुष दोनों ही नृत्य कर रहे हैं।’ सौम्या अब उसकी ओर मुखातिब है। ‘बात तो सही है’ कह कर वह हल्का सा मुस्कराया और अपनी राह चल दिया।
लैंसडोन नगर के बीचों-बीच बने ‘भुल्ला ताल’ अब आज के लिए बंद हो चुका है। राजीवजी सिफारिश करते हैं कि किसी तरह अंदर जाने की इजाजत मिल जाय। पर ये तो आर्मी के कमांड में है। इसलिए समय की पाबंदी पर सिफारिश का असर नहीं है। वर्ष- 2003 से यह ताल मिलेट्री के नये रंगरूटों (भुल्ला) द्वारा बनाना प्रारम्भ हुआ और वर्ष-2005 में बन कर तैयार हुआ। (भुल्ला, गढवाली भाषा में छोटे भाई को कहा जाता है। गढवाल राइफल्स में सीनियर सैनिक अक्सर अपने से जूनियर सैनिक को भुल्ला (याने छोटा भाई) कहकर संबोधित करते हैं।) लगभग 1 किमी. क्षेत्र में फैला इस ताल में बरसात और इधर-उधर से प्रवाहित जल श्रोत्रों का पानी है।

लैन्सडौन के नगर देवता कालेश्वर महादेव मन्दिर और सन् 1896 में बन कर तैयार सेंट मैरी चर्च तथा सेंट जॉन चर्च प्रमुख आकर्षण हैं। चर्च की अदभुत कारीगरी के साथ इनमें स्थित संग्राहलय और पुस्तकालय देखने योग्य है। वर्तमान में ये चर्च गढ़वाल राइफल्स रेजीमेंटस की सम्पत्तियां है।
तय हुआ कि जयहरीखाल से पहले झाड़ा पानी तक पैदल ही चलते हैं। बांज, देवदार, चीड़, बुरांश, सुरई, काफल के पेडों से घिरी सड़क पर गिने-चुने लोग ही आ-जा रहे हैं। फिर से, चौबटिया से झूलादेवी की सड़क और जंगल याद आ रहा है। बौंठ गांव की ओर जाने वाली पगडंडी के प्रारम्भ में ठंडी सड़क का बोर्ड लगा है। राजीव सड़क से नीचे की ओर दिखने वाले गांव परिंदा, बौंठ आदि गांवों को दिखाते जा रहे हैं। वे बताते हैं कि इस माल रोड़ पर केवल अग्रेंज चलते थे। हिन्दुस्तानी निर्धारित समय पर केवल आस-पास की पगडंडियों पर चल सकते थे।
अचानक सामने से हमारे ओर ‘बाख-बाख’ कहते हुए एक युवा भागते हुए आ रहा है। उसके मुंह से आवाज़ कम और उसकी सांसे ज्यादा सुनाई दे रही हैं। तुरंत, ‘मालामाल वीकली’ फिल्म का वो सीन याद आ गया जिसमें राजपाल यादव खुला मुंह लिए भागता है। घबराहट में उसका मुंह खुला का खुला रह जाता है और आवाज गायब हो जाती है। पता चला उस युवक को सड़क से ऊपर की ओर जाता हुआ बाघ दिखा। शाम के वक्त पानी और शिकार की तलाश में बाघ अक्सर अपनी गस्त पर रहते हैं। आने-जाने वाले लोग अभी भी इंतजार में हैं कि बाघ की हल्की झलक दिख जाय। पर बाघ तो बाघ हुआ, मिनटों में कहीं का कहीं चला जाता है।…
यात्रा जारी है…….
अरुण कुकसाल
ग्राम-चामी, पोस्ट- सीरौं-246163
पट्टी- असवालस्यूं, जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखंड
यात्रा के साथी- भानेश घिल्डियाल, लता घिल्डियाल, राजीव धस्माना, दीना कुकसाल, पूजा धस्माना, हिमाली कुकसाल और सौम्या घिल्डियाल।