चोरियां बचपन की

रमेश पांडेय ‘कृषक’
जब बहुत छोटा था यानी चोरी की सुरूआत में मिश्री गुड़ या फिर कभी कभीर घर में आने वाली मिठाई जिसमें गट्टे, रेबड़ी, चना जैसी चीजें ही होती थीं।
चोरी के बाद ससुरे सबूत तो इतने छूट जाते कि पकड़ने वाले के लिये परेसानी का सवाल ही नही था। वैसे तो घर में पटवारी की भूमिका में काखी, जैजा, आमा, और ईजा सभी होते थे पर इन सभी पटवारियों की सटवारी होती थी दीदी। सुरू सुरू में मार कान उमेरने, एक दो चटैक तक सीमित था पर फिर मार का विस्तार सिसूंण की छपैक, गोठ में काला पानी,एक छाक भूखे रखने का फरमान तक चला। एक बात और थी कि काखी के हाथ की फचैक पड़ने के दो चार घण्टे में एक बिलैती मिट्ठै या मिसिरी कणिक जरूर मिल जाता। जिस दिन ईजा फचकाती या गुठियाती तो रात सोते समय में सिर पर नौणी जरूर रखती। जिस दिन छाका रखा जाता तो उस रात दीदी का प्रेम पता नही कहां से उमड़ आता कि कैसे भी एक रोटी में घी चुपोड़ कर चुपचाप से खिला देने वाली ठैरी। बाद बाद में चोरियों का स्तर थेड़ा संगीन भी हो गया और रंगीन भी। पर मार अपने आप खतम हो गइ। इस स्तर की चोरी एक प्रकार की सामूहिक चोरी होने वाली ठैरी जैसे किसी खसूट का पूरा का पूरा नारंगी या माल्टा का पेड़ नंगा कर देना। ऐसी चोरियों के बाद हमारे अन्दर का बादसाह जरूर जग जाता था! ले महेश तू आठ दाण धर, ये स्याम तू अपण जाखटक जेब भर ले। सच तो यह है कि उन चोरियों में माल की बर्बादी ही करनी ठैरी, यहां बता दिया जाये कि ये बड़ी चोरियां उन खसूटों के बाड़ों में ही पड़ती जो फल सड़ जाये पर किसी को देते नही थे।
यह वही उमर थी जब घर वाले पिस्यूं पिसणै लिजि हमें घट भेजने जगे थे। गांव में एक जेठिज्या हुआ करती थी बड़ी कंजूस। अपने समय की सायद एक मात्र आंखर ज्ञाता थी जेठिज्या इसी लिये उनका नाम विकास की जेठिज्या पड़ गया था। जिस दिन हमारी टोली घट जाती तो जेठिज्या को नीद नही आती तो कारण भी साफ था कि हमारी टोली का पहला टार्गेट विकास की जेठिज्या का बाड़ा ही होता। एक दिन घट जा कर तय हुआ कि आज कच्चे केलों की सब्जी बनाई जाये। कच्चे केले गांव में ही मिल सकते थे, घट से करीब करीब डेड़ मील की सीधी चड़ाई थी गांव की। एक दराती और एक लम्बा जांठा पकड़ कर मैं और स्याम पहुंच गये गांव सबसे पकले विकास की जेठिज्या का ही लुटियाण पड़ता था तो वहीं जांठे में दराती बांधी और केले की सबसे बड़ी वाली घड़ी काट कर सिलम्बगड़ के घट पंहुचा दी। दूसरे दिन जब हम घट पीस कर लौट सहे थे तब जेठिज्या की गालियां चल रही थी कि कट्ठुओ तुम झन खैजाया मि रात भर माल्टा बोट पहरूण में छी तुमूल क्यावै घड़ी चोरदी। एैसे बीते बचपन को कैसे भुलाया जा सकता है।