इतिहास बनाता 'वाह रे बचपन'

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जयप्रकाश पंवार 'जेपी'

हिंदी साहित्य के विकास में प्रयोगधर्मी लेखकों ने जो योगदान दिया है, वह खासकर लेखकों की नजर में हमेशा आलोचना का पर्याय बनता रहा.

समालोचना करने वाले कम और आलोचना करके अपने लेखन, लेखकीय व स्वयं को चर्चा में लाने वाले लेखकों की कभी कमी नहीं रही. लेकिन हिन्दी साहित्य ज्यों – ज्यों प्रगति करता रहा, समयकाल ने ऐसे प्रयोगधर्मी लेखकों की महत्ता को समझा भी और सम्मान भी किया.

पिछले दो – तीन वर्षों से लोकप्रिय जनकवि व लेखक डॉ. अतुल शर्मा भी एक अनोखे प्रयास में लगे हुए हैं. 'वाह रे बचपन' पुस्तकों की सृंखला थमने का नाम नहीं ले रही. बाल लेखन में यह प्रयोग संभवत:  हिन्दी साहित्य में एक नयी धारा बना रहा है. डॉ. अतुल ढूंड-ढूंड कर आमजन से उनके बचपन के किस्से, कहानियां, संस्मरण लिखवा रहे हैं. जिन्होंने कभी लेखन जैसा कार्य नहीं किया, उन्हें उनके बचपन के जीवन्त संस्मरणों को लिखवाकर लेखकों की श्रेणी में लाने का कार्य इतिहास मेंदर्ज होता जा रहा है. अपने यौवन, प्रौढ़ता व बुढ़ापे की दहलीज पार कर रहे आम लोग अचानक लेखन के बहाने अपने बचपन की यादों को 'वाह रे बचपन' की पुस्तकों में संजों रहे हैं. इस लिहाज से वाह रे बचपन पुस्तक श्रिंखला हिन्दी साहित्य में कभी न ख़त्म होने वाली पुस्तक श्रृंखला है. जिसे जारी रखना अब एक जरुरी कार्य हो गया है. डॉ. अतुल शर्मा, रेखा व रंजना बहिनें जिस उत्साह के साथ इस महान उद्देश्य में लगे हैं यह एक रचनात्मक उम्मीद जगाता है.

'वाह रे बचपन' पुस्तक सृंखला के बारे में प्रसिद्ध कवि, लेखक, गीतकार व साहित्यकार यश मालवीय लिखते हैं कि अतुल शर्मा ने लगातार बचपन को संजोने व सहेजने का ऐतिहासिक कार्य किया है. वो देश के साहित्यकारों के मन में एक सार्थक सृजनात्मक पुलक भर गया है. कथाकार कमलेश्वर के शब्दों में कहें तो इसे हम आगामी अतीत भी कह सकते हैं. कवि अमरनाथ श्रीवास्तव की पंक्तियाँ याद आती हैं. 'जब भी भोली आँखों वाला बछा कोई मुस्कराता है, ढंग देखकर रंग बदलता अपनी राह याद आता है.' मैं 'वाह रे बचपन' पुस्तक सृंखला के चारों खण्डों से गुजर चूका हूँ. पांचवें खंड की तैयारी चल रही है, भाई अतुल को अनन्त सुभकामनाये.

दूरदर्शन से जुड़े डॉ. ओमप्रकाश जमलोकी लिखते हैं कि अतुल जी बचपन के नैसर्गिग प्रवाह को अविरल गति से पाठकों तक पहुंचा रहे हैं. यह सिरीज इतिहास की आवश्यकताओं को विशेषकर विकाश के इतिहास के लेखन व आंकलन की पूर्ति में सक्षम होगी.

लोकप्रिय गीतकार डॉ. धनञ्जय सिंह वाह रे बचपन लो आत्मकथ्यों की सृन्खलाओं का अनूठा प्रयास बताते हैं. वे लिखते हैं कि सुना है जवानी हर बात की काबिले तारीफ़ होती है, किन्तु बचपन वह अवस्था है जब ब्यक्ति के जीवन की अविरलता आधार शिला बन गयी होती है. हर ब्यक्ति के जीवन में बचपन कौतुहल से भरपूर रहता है. में इस रोचक सृंखला की सफलता के लिए दिल से मंगल कामना करता हूँ.

सुप्रसिद्ध ब्यंग लेखक उर्मिल कुमार थपलियाल 'वाह रे बचपन' सृंखला को आविष्कार मानकर सलाम करते हैं. वे लिखते हैं कि स्मृतियाँ कभी शेष नहीं होती बस उन्हें अवसर चाहिये होते हैं. हर व्यक्ति का जीवन एक लघुकथा से लेकर उपन्यास के विस्तृत फलक तक विस्तार पाटा है. यदि उसे लिख लिया जाए तो हो सकता है कि वह आंशिक रूप से ही सही लेकिन किसी न किसी को मोटीवेट तो कर ही सकता है.

डॉ. अतुल शर्मा द्वारा सम्पादित वह रे बचपन पुस्तक सृंखला के पांच खंड प्रकाशित हो चुके हैं, जिसमें अभी तक देश – प्रदेश के लगभग पांच दर्जन लेखकों व आम लोगों के अपने बचपन के संस्मरणों का संकलन किया जा चुका है. डॉ. अतुल बताते हैं कि लोग लगातार उन्हें अपने – अपने बचपन के संस्मरणों को लिखकर भेज रहे है. यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य जरुर है लेकिन यह दस्तावेज अब एक इतिहास भी बनता जा रहा है. कभी न समाप्त होने वाली इस सृंखला हेतु अतुल जी, रेखा व रंजना बहिनों को दिल से बधाई.

 

 

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