फूलदेई

Star InactiveStar InactiveStar InactiveStar InactiveStar Inactive
 

चारू तिवारी 

फूलदेई ने बचपन याद दिला दिया। जब हम छोटे थे तो फूलदेई की तैयारियों में लग जाते। पहला काम था 'सारी' में से मिझाउ के फूल तोड़कर लाना।

अच्छे से अच्छे फूलों से टोकरी को सजाने की रचनात्मकता। हमने रचनात्मकता का पहला पाठ फूलदेई से ही सीखा। फूलदेई ने हमें प्रकृति के साथ चलना और प्रकृति की समरसता के पैगाम को भी आत्मसात करने की शक्ति प्रदान की। हम एक ऐसे समाज में रहते थे जिसमें बहुत सारी वर्जनायें थी। बावजूद इसके फूलदेई उन वर्जनाओं को तोड़ देती थी। फूलदेई जहां प्रकृति का स्वत:स्फूर्त त्योहार है वहीं उस समय हम बच्चों की बहुत सारी आकांक्षाएं फूलदेई से रहती थी। जिन भी घरों में जाते महिलाएं बहुत स्नेह के साथ अपने घर बुलाती। हमें देहरी के अंदर ही जाना होता था। जो संपन्न थे वे कुछ खाने के लिये बना देते, जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होती थी वे तो कई दिन से किसी भी तरह हमारे लिये अच्छी—अच्छी चीजें रखते थे। उन्हें लगता था कि बच्चे आयेंगे तो उन्हें निराशा नहीं हानी चाहिये। गांव की महिलाओं में होड़ लगी रहती थी हमें ज्यादा चावल, ज्यादा गुड़ और पैसा देने की। उन दिनो एक, दो, तीन, पांच, दस, बीस, पचास पैसे के सिक्के चलते थे। ज्यादतर घरों से अधिकतम पांच पैसे मिलते थे। जिन घरों से इससे ज्यादा पैसे मिलते थे, वहां हमारा विशेष ध्यान होता था। कई घरों से मिठाई भी मिल जाती थी। मेरी ईजा तो पूरे घर को जैसे बच्चों के लिये भर देती थी। नये बच्चों की टोकरी को गांव के लोग विशेष रूप से भरते थे। गांव के सबको पता होता था कि किसके घर से नई टोकरी आने वाली है। बच्चों में इस बात की प्रतियोगिता भी होती थी कि किसकी टोकरी में ज्यादा चावल या गुड़ आया है। एक बार हम लोग फुलदेई खेल रहे थे। आराम करने के लिये एक खेत में बैठे थे। एक बैले उधर आ गया। वह मेरे पीछे पड़ गया। मैं ज्यादा दूर तक भाग नहीं पाया और मेरे हाथ से मेरी थाली गिर गई। मेरे सारे चावल, गुड़ और पैसे मिट्टी में मिल गये। मैं रोने लगा। बच्चों ने सांत्वना दी। लेकिन सालभर की कमाई एक झटके में चली गई। आज भी उस फूलदेई की कमाई को खोने की कसक बाकी है। एक और बात मुझे फूलदेई पर अपने मनेला के कमलापति बहुत याद आते हैं जो जिनसे हम बच्चों का छत्तीस का रिश्ता था, लेकिन फूलदेई पर वे सबसे ज्यादा चावल और गुड़ देते थे। एक ऐराड़ी के प्रेमसिंह थे जो हमारी 'सिमतया' में अकेेले एक मकान में रहते थे। हम उनके नींबू चुराते थे। उनके अंगूर भी थे उन्हें भी चुराते थे। वे हमें ढूढते रहते थे, लेकिन हम हाथ नहीं आते। साल में फूलदेई के दिन उनके देहरी में जाते फूल लेकर तो उन्हें याद ही नहीं रहता कि यही हैं वे बच्चे जिन्हें उनकी तलाश रहती थी। वे भी हमें बहुत सारे चावल देते। प्रेम सिंह ही ऐसे थे जो हमें गुड़ की जगह मिसरी देते थे। फिर लौटा दो काई मेरा बचपन। कोई लौटा दे फूलदेई।

फोटो - जेपी 

चैनल माउन्टेन, मीडिया के क्षेत्र मैं काम करने वाली एक अग्रणी एवं स्वायत्त संस्था है . जो की पिछले 21 सालों से सतत कार्यरत है.

Channel Mountain Ink


Contact for more details

 

आपके

लेख/ सुझाव/ विचार ...

सादर आमंत्रित हैं


संपर्क करें:

फ़ोन: +91 9411530755

ई मेल : paharnama@gmail.com