जहरीली शराब त्रासदी के परिपेक्ष

वीरेन्द्र कुमार पैन्यूली

उत्तराखंड आन्दोलन के सपनों को भी आघात पहुंचा है - जहरीली शराब त्रासदी के परिपेक्ष में उत्तराखण्डियों की वेदना को भी जगह दें।

उ प्र की सीमा से लगे उत्तराखंड के हरिव्दार जिले के एक गांव में 8 फरवरी 2019 को तेरहवीं के एक आयोजन के दौरान में व अन्यत्र भी अवैद्य जहरीली शराब पीने से सौ के करीब मौतें हुईं थी। उत्तराखंड में 38 लोगों की मौैं हुई थी। दोनो राज्यों की विधान सभाओं में तो इस हादसे पर चर्चा हुई। राज्य सभा में इस पर बहस की मांग को अध्यक्ष ने नहीं स्वीकारा। दोनो राज्यों के जिम्मेदार मंत्रियों ने षड़यंत्र की आशा भी जताई थी।

आम धारणा यही है कि अवैद्य शराब निर्माण व तस्करी में राजनीतिज्ञों व अधिकारियों की संलिप्ततायें भी रहती हैं। इस कांड पर उ प्र की लड़ाकू तेवरों वाली उन महिलाओं का जो वर्षाें से महिला सेनायें बना अपनी जान पर खेल अवैद्य शराब की भटिटयां पकड़वाती व तोड़ती रहीं हैं का कहना था कि उनका भी राज्य का पुलिस व प्रशासन उनकी मदद नहीं करता है अन्यथा अवैद्य शराब का ध्ंधा वे कब का बंद करवा देंतीं। उत्तराखड में भी पांच दशकों से ज्यादा समय से षराब के विरूध्द आन्दोलन करने वाली महिलाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का अनुभव व धारणायें इससे भिन्न नहीं हैं।

अविभजित उ0प्र0 मे भी पर्वतीय महिलाओं ने शराबियों व शराब बनाने वालों से लोहा लिया। उन्हे उन्होने बंद भी किया। श्राब की भट्टियो भी तोडीं। अपने गांवों में शराबीयों की बिच्छु घास से पिटाई भी की।दरवाजों में बन्द कर व बांधकर खोज खबर लेती रहीं हैं। ऐसी जंग वो आज भी जारी रखे हुए हैं। कई महिला मंगल दलों के सदस्यों पर मुकदमे भी दर्ज हुए हैं। 1970 में पहाड़ी जिलों में शराब ठेका केे विरोध में हुए उग्र आन्दोलनों में टिहरी गढ़वाल जिले में 28 महिलाओं को पीने वालों को रोकने व शराब के कारोबार में बाधा पहुंचाने के आरोप में जेल की सजा भी हुई थी। 60 के दषक के उत्तराध्र्द में भी पर्वतीय क्षेत्रों में सुरा और षराब के विरूध्द आन्दोलन हुए थे। पौड़ी में टिंचरी के दुकान में आग भी लगाई गई थी। इस अग्निकांड का नेतृत्व करने वाली बुजुर्ग महिला जिनका नाम दीपा देवी था उन्हे, आज दशकों बाद भी शराब विरोधी जुझारू आन्दोलनकारी टिंचरी माई के नाम से याद किया जाता है। कम उम्र में ही सैनिक विधवा हुई दीपा देवी सन्यासी बन गईं थीं। उन्होने अपना जीवन शिक्षा, पेंयजल, शराब विरोध में लगा दिया था। अपने क्षेत्र के लिए पेयजल की मांग दिल्ली पहुंच कर उनकी कार रोक कर उनसे जुझारू तेवर च से करने से प्रधानमंत्री नेहरू जी भी प्रभवित हुए थे।

शराब के विरोध में वे राज्य बनने के पहले से ही आन्दोलन करती महिलायें आज भी जेलों जा रहीं हैं। राज्य निर्माण के बाद भी उत्तराखंड की जुझारू महिलायें अभी भी इसीलिए आन्दोलनरत हैं कि उनके सपनों का उत्तराखंड अभी भी नहीं मिला। उनकी मांग नशा मुक्त उत्तराखंड की थी। महिलायें मानती हैं कि उन पर होने वाली हिंसा, परिवार के बिखराव व बच्चों में नषे के प्रसार के लिए षराब जिम्मेदार है।महिला सषक्तिकरण व कल्याण की सार्थकता के लिए वे राज्य की षराब नीति की प्रासंगिकता को भी वे बहुत महत्वपूर्ण मानती हैं। अभी इसी शराब कांड के बाद भी जब उत्तराखंड विधान सभा अध्यक्ष व्दारा बनाई गई विधायक खजान दास के नेतृत्व में बनी विधायकों की समिति शराब कांड के प्रभावित परिवारों से मिली तो महिलाओं का साफ कहना था कि राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू हो।

कम से कम जो भी सत्ता में हैं या हों या जो रहें हों उन्हे यह तो याद रखना चाहिए कि उत्तराखंड की उत्पति आन्दोलनों के गर्भ से हुआ है। आन्दोलनकारी महिलाओं और पुरूषों को मुजफफरनगरकांड जैसी बर्बरता व दैहिक अस्मिता को चोट पहुंचाने वाली बर्बरता को भी झेलना पड़ा है। जिसके घाव रह रह कर हरे हो जाते हैं। अतः सत्ताधारियों की आन्दोलन के सपनों के प्रति भी जिम्मेदारी है। आन्दोलन में एक सपना नशा मुक्त उत्तराखंड का भी था। इसी संदर्भ में यह वांछित है कि उत्तराखडं में हुई इस जहरीली शराब त्रासदी पर होती चर्चाओं के बीच 9 नवम्बर 2000 को ही दशकों के अन्दोलनों के बाद उ प्र के विभाजन से बने उत्तराखंड की पीड़ा को एक अलग संवेदना से भी विश्लेषित किया जाये। किन्तु जहां 1970, 80 व 90 दशकों के आन्दोलनों में, पहाड़ी क्षेत्रों की ही महिलायें ज्यादा सक्रिय थीं किन्तु अब ठेकों का विरोध महिलाओं की अगुवाई में मैदानी इलाकों में भी हो रहा है। हरिव्दार, देहरादून व उधमसिंहनगर जिलों की मैदानी इलाकों की महिलायें भी शराब के विरोध में आ गई हैं । उराखंड में महिलायें व अन्य आन्दोलनकारी राजमार्गों से भगाये गये व 220 मीटर्स के ठिकानों को ढूंढते हुए शराब व्यवसाइयों को अपने गांवों कस्बों में घुसनें नहीं दे रहे हैं।

महिलायें उत्तराखडं में षराब विरोधी आन्दोलन व गुस्सा को समान्तर सामाजिक सुधार आन्दोलनों के साथ भी जोड़ रहीं हैं है। उन आयोजनों व शादी - ब्याहों का वहिश्कार हो रहा है, जहां शराब परोसी जा रही है। क्योंकि इक्का दुक्का ही सही ऐसी भी, खबरें आ रहीं थी, कि अघ्यापक स्कूलों में कर्मचारी कार्यालयों मे शराब पीकर पहुंचने लगे थे। जंगलों में जहां स्थानीय जन का जाना भी प्रतिबंधित है वहां अवैद्य शराब की भटिटयां लगी हुईं थी। बिना शराब परोसे, कोई पारिवारिक, सामाजिक काम करना भी मुश्किल हो रहा है ।

राज्य बनने के बाद तो शराब से ज्यादा से ज्यादा राजस्व कमाना सरकारों की नीति रही है। इस वित्तिय साल में उत्तराखंड सरकार का लक्ष्य षराब से लगभग 3200 करोड़ रू का राजस्व प्राप्त करने का है, जो पिछले वर्ष से 500 करोड़ रू से ज्यादा ही होगी। आबकारी नीति उसी परिपेक्ष्य में बनी है। गांव - गांव में शराब का प्रसार बढ़ा है। शराब को हर हाल में बेचने की राज्य सरकारों की हठधर्मी इतनी रही है कि जिन स्थानों में शराब की दुकानों के विरोध मे महिलाओं का धरना प्रदर्शन होता है, वहां सरकारें ठेकेदारों को मोबाइल शराब वाहनों से शराब बेचने की पुलिस संरक्षण में छूट भी देती रहीं हैं। शराब की दुकानों के बाहर प्रदर्शन करने पर महिलाओं की गिरफतारियां भी हुईं है व उन पर मुकदमें दर्ज भी हुए हैं। राज्य बनने के बाद राजनैतिक दलों पर षराब व्यवसाइयों के पकड़ का एक चर्चित उदाहरण एक पूर्ववर्ती सरकार व्दारा उस कुख्यात सरकारी व्यापारी को दर्जाधारी मंत्री का पद दिये जाने का है जिसकी देष की राजधानी में एक फार्महाउस में हत्या कर दी गई थी।

12 फरवरी 2019 को जो कुछ विधान सभा में विधायकों ने कहा वह यह समझने के लिए पर्याप्त है कि राज्य की सरकारों ने महिलाओं के नषामुक्त उत्तराखंड के सपने को कितना ध्वस्त कर दिया है। पूर्व विधान सभा अध्यक्ष् गोविंद सिंह कुंजवाल बोले कि शराब का पैसा ऊपर से लेकर नीचे तक बंट रहा है। विधायक हरीष धामी ने कहा कि उत्तराखंड में अवैद्य शराब का कारोबार सफेदपोष नेताओं के संरक्षण में हो रहा है। इस घटना के बाद उस क्षेत्र के सत्तारूढ़ दल के विधायक देशराज कर्णवाल ने कहा है कि वे अपनी पत्नी के साथ उ प्र की सीमा से लगे इलाकों में महिलाओं की टोलियां बनाकर वे नशा के विरूध्द अभियान चलायेंगे। उन्होंने हरिव्दार और आस पास के क्षेत्र में पूर्ण नशाबंदी की मांग की है। यही नहीं अपने ही दल का सरकार को कठघरे में लाते हुए उन्होने यी भी कहा कि राज्य के आबकारी विभाग में राजनैतिक व आर्थिक आधार पर फैसले लिए जाते हैं। इसके पहले स्वय उत्तराखड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का इन मौतों के बाद कहना था कि उत्तराखंड नकली शराब का हब बन गया है।
राज्य में सस्ते राशन देने के लिए सरकारों को कम ही प्रतिवेदन मिले होंगे किन्तु सस्ती शराब देने के लिए प्रतिवेदन मिलते रहें हैं। अंतराल तक शराब के दुकानों के खुले रहने के समय बढ़ने के आवेदन पहुंच वालों की संस्तुतियों के साथ जब सरकार को मिले तो वो भी स्वीकृत किये गये।

आज षराब व्यवसाइयों की कानूनों के छेदों का फायदा उठा कर मदद की जा रही है। कानूनों की व्याख्या अपने ढंग से की जा रही है। एक मामला इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट की राजमार्गां से निष्चित दूरी तक षराब की दुकानों को न खेलने का तोड़ पहाड़ी क्षेत्रों में एक तरफ खांई आदि का हवाला देकर तथा पहले के राजमार्गों को निकाय पंचायत शहरी आदि मार्ग में वर्गीकृत कर निकाला गया है। इससे शराब व्यवसाइयों को गांवों तक घुसने का मौका मिला है। दूसरा मामला जनवरी 2019 में ही तीर्थधाम ऋषिकेश में सामने आया है। वहां नगर निगम क्षेत्र में गंगा के किनारे एक होटल को बार के लाइसेंस दिये जाने की खबर स्थानीय लोगों को लगी तो उनका गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने सरकार को इसे बंद करने का अल्टीमेटम दे दिया। तीर्थधाम के पास बार के लाइसेंस को सही ठहराने की आधिकारिक दलील ये दी गई कि हालांकि 2002 से धार्मिक क्षेत्रों में शराब की दुकान और बार बैन है किन्तु यदि उनमें नये इलाके जुड़ते हैं जैसे इस मामले में हुुआ क्योंकि ऋषिकेश नगरपालिका को निगम बना दिया गया है तो वहां धार्मिक क्षेत्र वाले नियम नहीं लगेंगे।

शराब की ज्यादा दुकानों को खोलने व उनको मंहगी करने के पीछे सरकारी तर्क यह है इससे लोग नकली व जहरीली शराब नहीं पियेंगे व उनके पास सही शराब पीने का विकल्प रहेगा। गांव गांव सरकारी शराब के ठेके खोल दिये गये हैं। य विरोध होने पर प्रशासन पुलिस इसलिए भी कुछ स्थानों पर तैनात करता रहा है कि ठेकेदार को शराब बेचने में व्यवधान न आये। सुगपुगाहट इसकी भी है कि शराब की होम डिलीवरी की अनौपचारिक व्यवस्था भी जारी है।

उत्तराखंड में शराबी सार्वजनिक राहों में उत्पात मचा रहें हैं। संभवतया इसीका संज्ञान लेते हुए नैनीताल उच्च न्यायलय ने एक बार अब स्थगित हुए आदेष में राज्य सरकार से यह भी कहा था कि वह सार्वजनिक रूप से शराब के पीने पर रोक लगाये और शराबियों के जमवाड़ों को इकठठा होने पर प्रतिबंध लगाये। ऐसा भ्रम भी नहीं फैलाया जाना चाहिए कि यह मांग केवल महिलाओं की है। 1970 के दशक में जब उत्तराखंड विश्वविद्यालय आन्दोलन गढ़वाल मंडल में चरम में था तो तत्कालिन उ प्र शराब गढ़वाल में शाराब प्रतिबंधन को समाप्त करने की येाजना बना रही थी तो अन्दोलनकारी युवाओं ने नारा दिया था कि हमें विष्व विद्याालय चाहिए विष विद्याालय नहीं। अस्सी के दशक में कुमायूं के जुझारू युवकों ने नषा नहीं रोजगार दो सषक्त आंदोलन षुरू किया था। अभी इसी साल 1 फरवरी से दो फरवरी 2019 को बंसबीडा में इस अन्दोलन की 35वीं वर्यागांठ मनाई गई। उत्तराखंड देष के प्रमुख सर्वौदयी गांधीवादी नेताओं का गढ़ है। वे सदैव से शराबबंदी आन्दोलन को नेतृत्व प्रदान करते रहे। 1965 में सुंदरलाल बहुगुणा जी व उनकी पत्नी विमला बहुगुणा ने टिहरी के ग्राम्रीण क्षेत्र में अवैद्य षराब के विरूध्द आन्दोलन छेड़ा था। ऐसा ही आन्दोलन कोटव्दार क्षेत्र मानसिंह जी व उनकी पत्नी करते रहे थे। बापू की यूरोपियन षिष्या सरला बहन भीं मद्यनिषेध आन्दोलनों में शामिल रहीं हैं। को गढ़वाल में आकर समर्थन दिया था। समय समय से उत्तराखंड के संत भी समर्थन देते रहें हैं।


लेखक लगभग पांच दशकों से सामाजिक कार्यों व लेखन में है। उत्तराखंड राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार है।

 

चैनल माउन्टेन, मीडिया के क्षेत्र मैं काम करने वाली एक अग्रणी एवं स्वायत्त संस्था है . जो की पिछले 21 सालों से सतत कार्यरत है.

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