रास्ता तो निकलेगा

चारू तिवारी 

यह आदमी कैसे चार्टड अकाउंटेंट बन गया मेरी समझ में नहीं आता। हिसाब-किताब के क्षेत्र में तो थोड़ा कठोर होना पड़ता है।

अंगुली में गिनकर सबकुछ करना हुआ। कैल्कुलेटिव होना पड़ता है। चालाकी-जुगाड़ भी चाहिये। लेकिन हल्द्वानी के युवा चार्टड अकाउंटेंड सरोज आनंद जोशी से जब आप मिलते हैं तो एक ‘ठेठ’ पहाड़ी से मुलाकात होती है। सरल और सहजता लेकिन गर्मजोशी के साथ शुरू हो जाते हैं। कई शिकायतें रहती हैं उन्हें व्यवस्था से। लोगों से। साहित्य, संगीत, कला, जनसरोकारों का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जिस पर वे अधिकारपूर्वक बोल न सकते हों। लोकसाहित्य, संगीत से तो उनका बचपन का रिश्ता है। घर में ‘कटकि चाय’ पिलाने वाले इस ‘पिथौरागढ़ी’ की आजकल होली की महफिल जम गई होगी। दिल से पहाड़ को जीने वाले सरोज के लिये हमें कई बार कई ‘बैरियर’ लगाने पड़ते हैं।

सर्वजीत टम्टा युवाओं में ऐसा नाम है जो सूफी गीतों के नये हस्ताक्षर हैं। उन्होंने देश के सूफी गीतों को जितने गहराई से आत्मसात किया है, पहाड़ के गीतों को भी सूफी अंदाज में ढाला है। गिर्दा के कई गीतों को उन्होंने नये अंदाज में गाया है। बहुत छोटी उम्र में उन्होंने न केवल संगीत की बारीकियों को समझा है, बल्कि उन्हें उसका बोध बहुत गहरे तक है। यही वजह है कि उन्होंने अपने गीतों को सामाजिक बदलाव का हथियार भी बनाया है।

रामनगर के शिक्षक नवेन्दु मठपाल हैं। नवेन्दु ने एक शिक्षक के रूप में तो अपनी विशिष्ट पहचान बनाई ही है, रचनात्मकता और सामाजिक चेतना की बड़ी समझ भी उनके पास है। वे कई सामाजिक-सांस्कृतिक-साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े रहते हैं। युवाओं को रचनात्मकता के लिये प्रेरित करते हैं।

रिवर्स पलायन को मूर्त रूप देने वाले हैं देहरादून के अर्जुन सिंह। दिल्ली में रहते थे। अब अपने गांव घेसगांव में मटर की खेती कराते हैं। घेस के बारे में कहा जाता है कि — 'घेस के आगे नहीं देश'. अपनी मेहनत से उन्होंने ऐसा विश्वास जगाया है कि अब उनकी मटर खरीदने के लिये बनारस तक से लोग आते हैं। उन्होंने वहां लोगों को खेती के लिये प्रोत्साहित किया है।

हमारे बहुत अनन्य साथी हैं ऋषिकेश के संजय बुडाकोटी। संजय को आप उत्तराखंड के किसी भी आंदोलन में देख सकते हैं। कितनी ऊर्जा है इस युवा में। राज्य आंदोलन में जेल रहे। राज्य आंदोलनकारी हैं। पहाड़ के हर बदलाव में संजय हमारे साथ रहते हैं। चकबंदी आंदोलन में लगे हैं। इस समय गैरसैंण राजधानी आंदोलन में सक्रिय हैं।

कोटद्वार के मुजीब नैथानी की अपनी ही ठसक हैै। सामाजिक सरोकारों से जुड़ा यह युवा हर समय सबसे ‘पंगा’ लेते रहता है। उसके निशाने पर कब कौन आ जाये कहा नहीं जा सकता। हमारी भी कई बार ‘शामत’ आ जाती है। उत्तराखंड के बदलाव की इतनी जल्दी कि अपनी ही पार्टी बना डाली। नाम रखा उत्तराखंड विकास पार्टी।’

आप कभी भीमताल से नैनीताल की ओर जा रहे हों तो आपको एक प्रतिष्ठान अपनी ओर आकर्षित करेगा। आप यहां रुके बिना नहीं रह सकते। यह प्रतिष्ठान है फ्रूटएज। पहाड़ में फल आधारित उद्योग का एक जाना-पहचाना नाम। इसके संस्थापक हैं संजीव भगत। संजीव ने उत्तराखंड में स्वरोजगार से जिस तरह आत्मनिर्भरता का रास्ता बनाया वह नीति-नियंताओं को भी रास्ता दिखाने वाला है। उनके पास आम पहाड़ी युवा की तरह सरकारी नौकरी रास्ता खुला था। उन्हें वह मिली भी। सरकारी नौकरी के बजाए उन्होंने स्वरोजगार को चुना। अपने रोजगार को भी उन्होंने बहुत रचनात्मकता के साथ सजाया-संवारा। उनके पास जाम, जैली, जूस के अलावा पहाड़ के फलों पर आधारित बहुत सारे उत्पाद हैं। सुन्दर पैक और बहुत गुणवत्ता के साथ। संजीव कभी पत्रकार थे। उनके अंदर पहाड़ को संवारने की दृष्टि है। काश! सरकारें उनके अनुभव को अपनी नीतियों में शामिल कर पाती। संजीव पहाड़ की युवा करवट के एक ऐसे उत्प्रेरक हैं, जिनमें हम पहाड़ के आत्मनिर्भर बनाने की समझ को न केवल देख सकते हैं, बल्कि उसे धरातल पर उतारने की जिजीविषा भी है।

श्रीनगर के समीर रतूड़ी को हम सब लोग जानते ही हैं। मलेथा को बचाने के लिये उन्होंने न केवल बड़ा आंदोलन खड़ा किया, बल्कि समय-समय पर उत्तराखंड के सरोकारों के लिये आपको खड़े मिलेंगे। हिमालय के सवालों पर वह ‘हिमालय बचाओ आंदोलन’ के तहत उठाते रहते हैं। सत्ता प्रतिष्ठानों से टकराने और उनसे मठभेड़ के कारण कई बार कई लोगों की आंख की किरकिरी भी बनते हैं।

पौड़ी में ही हमारे साथी हैं ललित मोहन कोठियाल। पहाड़ को समझने की उनकी दृष्टि कमाल की है। लंबे समय से लिखने, पढ़ने, घूमने और सामाजिक सरोकारों के साथ खड़े होने के साथ वे हमारी सांस्कृतिक और पर्यावरणीय चेतना के प्रति भी सजग रहते हैं। बेहतर समाज का सपना देखने वाले सभी साथियों के साथ खड़े मिल जायेंगे। अभी वे चकबंदी आंदोलन और उमेश डोभाल स्मृति न्यास के माध्यम से नई सोच को आगे बढ़ा रहे हैं।

उन्हें आप कैमरे के साथ किसी भी डांडे-कांडे में देख सकते हैं। उन्हें यात्रायें और ट्रेकिंग करते देखा जा सकता है। कई डाॅक्यूमेंटरी, विज्ञापन फ़िल्में व रेडियो कार्यक्रम बनाये.  चैनल और पोर्टर चलाते हैं ‘चैनल माउंटेन’ के नाम से। बहुत रचनात्मक हैं जयप्रकाश पंवार। हम उन्हें जेपी के नाम से जानते हैं। गैरसैण सहित कई पुस्तकों के लेखक, किसी भी बदलाव के स्वरों में उनकी आवाज घुली-मिली है। अपनी तरह से वे समाज को देखते हैं। हिमालय तो उनके अन्तर्मन में बसता है।

एक युवा हैं अनिल पांडे। बहुत छोटी उम्र है। हमारे छोटे भाई की तरह हैं। चीन में रहते हैं। बीजिंग में। जब हमारे साथ दिल्ली में भी थे तो पहाड़ के अलावा शायद ही कोई बात होती हो। अब जब पिछले कई सालों से चीन में हैं तो वहां से भी पहाड़ को अपने नजरिये से देखते हैं वहां के आलोक में कई बार लिखते-बोलते भी हैं। बीजिंग रेडियो में कार्यरत हैं। उनके अनुभव आने वाले दिनों में हमारे काम आने वाले हैं। उन्हीं के बड़े भाई हैं जयप्रकाश पांडे। तीन साल चीन में रहकर वापस आये हैं पहाड़ में। अपना कारोबार करेंगे। मूल रूप से पत्रकार हैं। बहुत संवेदनशील। पहाड़ की चिंता और उस पर कुछ करने की मंशा। जब चीन में भी थे भारत के अखबारों में अपने गांव और प्रदेश के बारे में तुलनात्मक लिखते रहे हैं। इनके पिताजी भी उत्तराखंड के आंदोलनों से जुड़े थे।

ऋषिकेश में हमारे साथी हैं धनेश कोठारी। साहित्यिक, सांस्कृतिक, रंगमंच, सिनेमा आदि विधाओं पर उनकी अच्छी पकड़ है। पहाड़ के सवालों को अलग-अलग मंचों से उठाते रहते हैं। उत्तराखंड की कला, संस्कृति, भाषा और रंगमंच पर लिखने वाले विरले लोगों में से हैं। गढ़वाली के अच्छे कवि भी हैं। मदन डुकलान में बारे में कितना बता सकता हूं। संक्षिप्त में इतना ही कि मदन डुकलान एक बहुत अच्छे कवि हैं। लेखक हैं। रंगकर्मी हैं। सिनेमा में अभिनय करते हैं। उनके हर काम में पहाड़ की संवेदनायें बहुत गहरे तक हैं। बहुत सरलता के साथ पहाड़ के गूढ़ सवालों को समझते हैं। उसके समाधान के लिये प्रतिकार के रास्ते भी तलाशते हैं। उनके साथ खड़े रहते हैं। गढ़वाल के कथा और कविता साहित्य पर जिस तरह का उन्होंने शोधपरक काम किया है वह प्रशसंनीय है। ओएनजीसी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में प्रबंधक पदपर कार्यरत हैं।

लोहाघाट के मनीष ओली हैं। उत्तराखंड पावर कोरपोरेशन में विद्युत उपभोक्ता निवारण मंच के सदस्य हैं। वे कई विधाओं के जानकार है। लंबे समय तक पत्रकारिता की। कई डाॅक्यूमेंटरी बनाई। उत्तराखंड में घूमते रहते हैं। दो पुस्तकें लिख चुके हैं, ‘जादुई बुग्यालों के बीच’ और ‘मद्यों। एक लघु फिल्म पर सम्मान भी मिला है। पहाड़ में कुछ नया करने की छटपटाहट हमेशा उनमें बनी रहती है।

पौड़ी से हमारे पास अमित सागर हैं। उत्तराखंड के गीत-संगीत पर उनके प्रयोग नई पीढ़ी को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। चैत्योली गाकर उन्होंने युवाओं के एक बड़े वर्ग को अपनी जड़ों की ओर लौटने की सांस्कृतिक चेतना दी है। बताया जाता है कि इंटरनेट पर ही उनके गीत को अब तक साठ लाख से ज्यादा लोग देख-सन चुके हैं। पांडवाज गु्रप ने नई पीढ़ी को अपने गीत-संगीत से जोड़ने का बड़ा काम किया है। श्रीनगर जैसी जगह में स्टूडियो खोलकर उन्होंने यह भी बताया है कि अगर इच्छाशक्ति हो तो बड़े से बड़ा काम छोटी जगहों से बड़ों को टक्कर देने वाला किया जा सकता है। तीनों भाइयों कुनाल, ईशान और सलिल ने जिस तरह संगीत की हर विधा में विशेषता हासिल की है उसने युवाओं के एक बड़े वर्ग को प्रेरित किया है। पांडवाज ने हमारे गीत-संगीत को सीमाओं से बाहर जाकर व्यापक मंच और पहचान दी है। उनके संगीत में प्रयोग लाजबाव हैं। समझ भी साफ है। उसे जन-जन तक पहुंचाने की रणनीति भी।

किशन महिपाल ऐसे युवा हैं जिन्होंने बहुत तरीके से हमारे लोकगीतों को नये संगीत के साथ बिना किसी छेड़छाड़ के प्रस्तुत किया है। अपने गीत तो हैं ही, किशन ने पुराने लोकगीतों को भी बहुत अच्छे संगीत के साथ नयापन दिया है। उनके गीत और समाजों के लोग भी सुन रहे हैं। पिछले दिनों ‘फ्यूलडिया त्वे देखि... और ‘भाना ओ रंगीली...’ को जिस तरह लोगों ने सुना है उसने प्रवास और विदेशों में रह रहे युवाओं को भी अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिये प्रेरित किया है। ‘राणिखेता राम...’ और ‘घुघुती...’ का तो जबाव ही नहीं। मंचीय प्रस्तुतीकरण में उनका जबाव नहीं।

इस बीच दो और गायिकाओं ने हम सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है। उनमें एक है हेमा नेगी करासी। जागर शैली की इस युवा गायिका ने लोकगीतों को नया आयाम दिया है। उन्होेंने पुरानी विधाओं को जिस तरह से नये रंग में लपेटा है वह अद्भुत है। जब वह गाती हैं तो हमारा पूरा समाज उसमें उतर आता है। उन्हें सुनना जितना सुखद है उतना ही उन्हें स्टेज पर गाते देखना-सुनना। उन्होंने अपने गायन को पहाड़ की परंपरागत पहनावे और उसकी लोक की ‘ठसक’ के साथ प्रस्तुत किया है। एक तरह से उन्होंने हमारी गायन पंरपरा में नये रंग भरे हैं। जौनसारी गायिका रेशमा शाह को सुनने का मतलब है लोक में खो जाना। रेशमा ने इस उम्र में जिस तरह जौनसार के लोक को पकड़ा है, उसमें एक नई ऊर्जा भर दी है। जौनसार के गीतों को अब उत्तराखंड ही नहीं वहां के बाहर के लोग भी सुनने-समझने लगे हैं। उनका स्टेज परफारमेंस तो गजब का है। जब वह स्टेज पर आती हैं तो लोक का नया आकाश खुल जाता है। ये सभी युवा हमारी सांस्कृतिक धरोहर के पहरेदार हैं। मुझे लगता है कि इन्होंने लोक को बचाने और उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने तक की समझ पैदा की है।

इस कड़ी के अंत में कुछ ऐसे लोगों का जिक्र जो हमारी इस पौंध को आगे ले जाने में पृष्ठभूमि का काम करते रहे हैं। इनमें एक नाम है रंगमंच के जाने-माने हस्ताक्षर श्रीष डोभाल का। श्रीष डोभाल ने 1984 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से पासआउट किया। उन्होंने उत्तराखंड में रंगमंच को स्थापित करने के लिये ‘शैलनट’ की स्थापना की। उनके पास राष्ट्रीय मुख्यधारा के रंगमंच में जाने के सारे रास्ते खुले थे। उसमें वे आज भी सक्रिय हैं, लेकिन उन्होंने पहाड़ मे रंगमंच को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पहाड़ के हर जिले में उन्होंने ‘शैलनट’ के माध्यम से पहाड़ी रंगमंच परंपरा को आगे बढ़ाने का काम किया। डाॅ. सुवर्ण रावत भी एनएसडी पासआउट हैं। उन्होेंने उत्तरकाशी में ‘कला दर्पण’ के नाम से रंगमंच संस्था बनाई। इसके माध्यम से लगातार यहां के रंगमंच के लिये काम करते रहे हैं। आज भी कर रहे हैं।

हल्द्वानी में एक और नाम है डाॅ. डीएन भट्ट का। डीएन भट्ट शिक्षक हैं। उत्तराखंड के जनसरोकारों से जुड़ने के अलावा उन्होंने लंबे समय से यहां के रंगमंच को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अन्त में हमारे साथी मनोज चंदोला जी। मनोज चंदोला हमेशा दिल्ली में रहे उनका जन्म भी दिल्ली में ही हुआ। 1984 में उन्होंने ‘अभिव्यक्ति कार्यशाला’ के नाम से एक सांस्कृतिक संस्था की नींव रखी। पहले हिन्दी रंगमंच में सक्रिय थे। पिछले एक दशक से वे उत्तराखंड की रंगमंचीय गतिविधियों के अलावा वहां के सरोकारों के लिये भी काम कर रहे हैं। पहले उन्होंने ‘राजुला’ नाम से फिल्म बनाई। पिछले चार साल से वे ‘आह्वाहन’ नाम से प्रतिवर्ष उत्तराखंड के सवालों पर तीन दिन का आयेाजन करते हैं। इस वर्ष उन्होंने एक बहुत प्रशंसनीय काम किया। उत्तराखंड रंगमंच के पिछले सौ सालों के सफर पर उन्होंने ‘उत्तराखंड रंगमंच शताब्दी नाट्योत्सव’ नाम से साल भर उत्तराखंड में कुमाउनी और गढवाली नाटकों को मंचन कराया। इस प्रकार एक पूरा अध्याय है हमारी समृद्ध थातियों को आगे बढ़ाने वाले लोगों की। उम्मीद की जानी चाहिये कि कभी कोई रास्ता जरूर निकलेगा।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार व पर्वतीय चिन्तक हैं 

(युवाओं को जानने का क्रम जारी है। अगली बार कुछ और युवाओं के साथ....)

चैनल माउन्टेन, मीडिया के क्षेत्र मैं काम करने वाली एक अग्रणी एवं स्वायत्त संस्था है . जो की पिछले 21 सालों से सतत कार्यरत है.

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