रैबार से निकलते रैबार

वीरेन्द्र कुमार पैन्यूली 

कहानी एक राज्य की है।

उस राज्य की ख्याति यह थी कि वह विभिन्न स्त्रोंतों सें उपलब्ध अपनी आय का अस्सी प्रतिषत वेतन और बचे बीस प्रतिषत को ही वो भी पूरा नही क्षेत्र मे कामों पर लगाता था। राजषाही फुल कर कुप्पा इसलिए थी कि भले ही राज्य गरीब हो रहा हो, परन्तु आंकड़ों में लोग नित माला माल हो रहे थे। राज्य में कर्ज लेकर भी घी पीने की परम्परा सालों साल से चल रही थी। झोली मे जब जब कर्ज की सौगात पहुंचती थी तो सत्ताधारियों की बांछें खिल जाती थीं। राजपरिवार और उनके मनसबदार अपनी पीठ थपथपाते थे। भले ही वह बोझ अंततः जनता पर आता था। यह बोझ करोड़ों - करोड़ रू का हो गया था। कर्ज लेने में क्या हर्ज है, जब चूकाना दूसरे को हो। ऐसे ही माहौल में एक बार तो यह हुआ कि राज्य के राजाओं को कई गज केक राज्य के जन्मोत्सव के बीच काटने का औचक सुख भी मिला। जिस राज्य का जन्मोत्सव मनाया जा रहा था वह राज्य जनता ने विषेशकरमहिलाओं युवाओं ने कुर्बानी से नक्षे पर बनाया था। परन्तु उसके बाद लडडू केक सत्ताधारियों दर्जाधारियों के ही हाथ लगते रहे। केक काटते -काटते उत्सव के क्षणों में जनता को उत्सव का एहसास दिलाने के लिए राजा के मन में एक बात उठी। जगह - जगर मुनियादी करा दी गई कि जल्दी ही रैबारों का एक रिकार्ड भी बजाया जायेगा। दरबार उसको बन्द कमरे में सुनेगा सेन्सर करेगा और फिर जनता के लिए लोकधुन तैयार की जायेगी। उसी राज्य में पहले की पीढ़ी की एक राजा ने राजधर्म निभाते राजगीत भी बनवाया था। उसका रिकार्ड भी षायद कम ही बजा। कम से कम रैबार में न किसी को उसकी सुध आई न बजाया। षायद गीत के बोल से ज्यादा मन के बोल और कानून का अड़ंगा है। तो फिर लौट आयें उसी रैबार पर जिसके लिए षानदार कर्जदार राज्य ने कुछ लोगों को अपने धर डबल ताकत से बुलाया। उनमें वो भी थे जो अचानक ही और षायद किसी शड़यंत्र के कारण राज्य में भी और बाहर भी अकारण ही निषाने पर आ गये थे। वे रैबार षुरू करें इसके पहले कई तरह के रैबार उनके नाम आ गये। जैसे तैसे रैबार दिया भी गया और सुना भी गया। रैबार को प्रजा ने कोई भाव नहीं दिया भला ही रैबारियों के लिए पैसा जनता का ही लगा हो। न उसके कानों में जूं रेंगी, न उत्सुकतावष उसने इसके लिए कानाफूसी की।

कहानी आगे बढ़ती है रैबार का उत्सव जब खत्म हुआ तो लगा था अब जन धुन का रिकार्ड बजेगा। पर ऐसा हुआ नहीं। जो आये थे उनके बारे में जाने की कोषिष की जा रही है कि क्या उनके जिम्मे रैबार देना ही था या ले जाना भी था। हालांकि रैबारों को लेकर आम समझ तो यही रहती है कि रैबार संदेष वाहक के माध्यम से और जब मिलना न होता है तब रैबार दिया जाता है। पर उस राज्य ने आमने सामने की रैबार की परम्परा कायम करने में भी काबिलेतारीफ सफलता प्राप्त की थी। प्रजा की जानकारी में यह था कि दरबार ने षायद रैबार दिया था कि जिनको बुलाया जा रहा है वो आयें और अपनां संदेष सुनायें। हमें हमारी ताकत बतायें। बतायें हम क्या कर सकते हैं। खास मानने वाली षर्त यह थी कि सब ज्ञान प्रवचन और श्रवण दिवारों दरवाजों और षायद पहरों के भीतर ही होगा। अन्यथा डर यह है कि बाहर के हालात देखकर राजकुमार को पीढ़ा दायक सच्चाई का भास हुआ कहीं वह सत्ताधारी आगुन्तुकों को न हो जाये। गनीमत है कि संदेष खुले में पूरे मन से भगवान को पीठ दिखाकर वहां नहीं हुआ। भगवान को पीठ दिखाने का भी संदेष आस्थवानों कोदहला देता है। साल दो साल या उसके पहले ही अनहोनी की भी आषंका रहती है ऐसा देवस्थलों पर रहने वाले मानते हैं। परन्तु तार्किक लोगों का कहना हैं कि षायद भगवान को पीठ दिखाकर संदेष देने वाले को यह ताकत मिलती होगी कि भगवान जब पीठ पीछे है तो हमसे ज्यादा बलवान कौन है। चाहे पहाड़ों को रौंदें। चाहे जंगलों को रौंदे। चाहे नदियों को मरोड़ सुरंग की भेंट कर दें। नदियों को हम पूजते जरूर हैं। चाहते हैं वह सब कुछ हमारे लिए करे परन्तु वह सब जिन्दा मानव की तरह न करे।

आइये फिर बंद कमरे में रैबारों के आदान प्रदान से जुड़े प्रसंग पर आयें। बताते चलें कि उस कर्ज भार ग्रस्त राज्य में जिनको संदेष सुनने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा था वे खुद अपने ढंग से संदेषों की व्याख्या करते में भी माहिर थे। जब उनके राज्य में अक्सर महामहिमों और महानुभावों को उन ढहते राजमार्गो के सडकों के खतरों से बचा कर जिन पर गिरते पत्थर ढहते पहाडं वाहनों पर पैदलों पर गिरने में भी मुरव्वत नहीं करते हैं, नभमार्गों से ले जाया जाता था दरबारी बयान रहता था कि महामहिमों ने रैबार दे दिया कि यात्रा मार्ग सुरक्षित हैं। महामहिम उवाच तो सब सही। रात में सूरज कहा तो सूरज। बच्चे तो बच्चे ही होते हैं उनमें जुलूस के नंगे राजा को नंगा कहने की हिम्मत होती है। उनका रैबार था कि हम मरते डरते गिरते नदी नाले पार कर स्कूल जाते हैं। परन्तु बच्चे क्या रैबार दे रहें हैं, उसको सुनने की फुरसत किसे है। घरों के पास के हजारों स्कूल बंद हो रहें हैं। आस - पास के नषेड़ीयों षराबियों से वो बेहाल हैं।

उस राज्य में ही तीन साढ़े तीन गज का केक काट कर जिन दिनों जष्न का माहौल बना हुआ था उन्ही दिनों प्रजा के लाखों लोगों का स्वास्थ्य सुरक्षा कवच खत्म हो रहा था, उन्ही दिनों सैकड़ों गांव अपने अस्तित्व के लिए अपने गांवों को भूमाफियाओं से बचाने के लिए लामबध्द थे। ऐसे गांवों, ऐसे बच्चों ऐसी गर्भवती माताओं और स्कूलों को बचाने के लिए इन रैबारी विषेशज्ञों ने क्या कोई रैबार छोड़ा है आतिथ्य का कोई टिप दिया है यह जानने की उत्सुकता आज भी उस राज्य में बनी हुई है। हमारी कहानी के राज्य की एक मामले में तो तारीफ करनी पड़ेगी कि उस राज्य के राजाओं को जागिरदारों को राजधानी बनाने का मोह कभी नहीं रहा। नहीं तो इतिहास में तो राजाओं को राजधानी बनाने का बड़ा षौक रहा है। परन्तु वहां की जनता ने राजधानी मांगने की जिदद पकड़ ली है। राजा जो भी बना कहता आया कि मैं इस मौसम में फलां जगह रहूंगा, उस मौसम में फलां जगरह रहूुगा। जनता कह रही है उसकी सुन ली जाये। राज दरबार अपनी सैण को छोड़ कर गैर की सैण में ही राजधानी बना दे। परन्तु हुक्मरानों तक यह रैबार जा ही नहीं रहा है। जनता की तैयारी फिर नगाड़े बजाने की हो रही है।

वह राज्य कुछ मसलों को लेकर संवेदनषील भी है। कहीं छपा और प्रजा ने उस राज्य में पढ़ा भी था कि एक क्षेत्र में दरबार को यह बहुत नागवार गुजरा कि कुछ अधिकारी फेलती भांग को खत्म करने का बीड़ा उठाये हुए हैं। वनस्पति जगत के प्रति संवेदनषील होने का भी राजधर्म है। मौके पर ही रैबार आया कि नीति विरूध्द काम न हो। भांग को तो बागवानी सा संरक्षण मिलना चाहिए। उस राज्य में जब सराब के कारोबार फलने फूलाने के लिए कारिन्दे सख्त हैं। बगावत करते महिलाओं और बच्चों को भी नहीं बख्ष रहें हैं तो भांग जैसे मामले को लेकर तो अब तक अधिकारी कर्मचारियों को संदेष मिल ही जाना ही चाहिए था। मालूम नहीं विषेशज्ञ रैबारियों के सामने ऊपर गिनाये जैसे चुनिंदा विशय समाधान जानने के लिए प्रस्तुत किये गये या नही। पता नही उनसे प्लस माइनस का सही उत्तर जाना गया या नहीं। या जीरो टौलरेन्स में जीरो का क्या मान होता है, यह जाना गया की नही।

उस राज्य में चूंकि बेखैाफ डग्गामारी, किडनी कांड, पंचायतों के व कर्मचारियों के पैसों की हकमारी मानव तस्करी जैसे मसले खुद ही मीडिया में रैबार दे गये थे। आगुन्तकों की जानकारी में तो यह आ ही गये होंगे यह सोचकर भी इन छोटे मोटे सवालों को भी मंहगे कन्सलेलटैन्टों के सामने न उठाकर आकाओं व्दारा समय व पैसे की जो बचत रैबार लेने व देने के उत्सवी आयेजन में की गई उसकी सराहना आमंत्रित भी कर रहें होंगे। ऐसा तो नहीं हो सकता था कि आतिथ्य भी पायें और खरी - खरी भी सुना जायें। अपनों के झूट को भी नजरअन्दाज करना पड़ता है। ऐसे भी तो राज्य होते जहां भले ही खुले में शौच जारी हो पर राज्य रिकार्डों में खुले में शौच मुक्त राज्य है। वहां हजार के करीब स्कूलों में शौचालय नहीं हैं। 25,377 ऐसे स्कूल शौचालय हैं जहां पानी के कनेक्शन नहीं हैं। जब जश्न मनाया जा रहा था तभी दरबार ने यह फरमान भी दिया था कि आला अधिकारी देख लें कि बच्चे कैसे पढ़ाई कर रहें हैं। आखिर नौनिहालों का भविष्य संवारा जाना है। तो जानते हैं क्या हुआ। एक स्कूल में एक बच्चे ने एक राजसेवक से पूछ ही लिया हमारे राज्य में आखिर इतना भ्रष्टाचार क्यों हैं। पता नहीं बच्चे का सवाल राज दरबार किसी रैबार के जरिये पहुंचा या नहीं ।परन्तु यह कहानी में तो आ ही गया है। मैं तो पहले ही इंगित कर चुका हूुं कि बच्चे सहजता के पर्याय भी होते हैं। राजा नंगा है कहने की उनमें सहजता होती है। इसका हिम्मत या नफा नुकसान से कोई लेना देना नहीं होता है। तो कहानी उसी राज्य की है। बच्चेां में देवत्व होता है किसी भी देवभूमि में उनके बोलों से निकले रैबार को अनसुना करने का जोखिम नहीं उठाने चाहिए। पीठ का भगवान सामने आकर बोल रहा है।

ये लेखक के विचार हैं 

फोटो सौजन्य - डॉ जे.पी. मेहता  

चैनल माउन्टेन, मीडिया के क्षेत्र मैं काम करने वाली एक अग्रणी एवं स्वायत्त संस्था है . जो की पिछले 21 सालों से सतत कार्यरत है.

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