राजी खुशी रयां

अरुण कुकसाल

फरवरी, 2007 की 26 तारीख है । सायं के 5.45 बजे हैं। मैं शिक्षा निदेशालय, देहरादून में हूं। मोबाइल पर अपने गांव चामी का नाम देखकर तुरन्त बीमार मां का ध्यान आता है।

हे भगवान! मोबाइल तो आॅन कर लिया पर सुनने के लिए हिम्मत जुटानी पड़ती है। मेरे हैलो... कहने से पहले ही पिताजी की आवाज ‘ तेरी मां नहीं रही बेटा ’ सुन लेता हूं। कब-कैसे की बात खत्म करके मैं अपने चारों ओर नजर दौड़ता हूं। साथी लोग 01 मार्च, 2007 को दिल्ली में होने वाली प्रस्तावित बैठक की तैयारी में जुटे हैं। अब क्या करना है, यह सोचने के लिए बगल के खाली कमरे पर पडी़ कुर्सी में बैठ जाता हूॅ। यह तो होना ही था। मां के पास जाना है, सोचते-सोचते महीना बीत गया और आज यह दिन भी आ गया। नौकरी के जंजाल ने घर-परिवार के दायित्वों के प्रति इतना संवेदनहीन बना दिया कि एक दिन भी मां के लिए गांव न जा सका। आखिर किसके लिए यह दौड़ा-दौड़ी। मैं अब भी बिल्कुल सामान्य। सब कुछ समझते हुए भी सच को स्वीकार नहीं कर पा रहा हूं। मां नहीं रही का मतलब समझता है तू, मैं अपने आप से मन ही मन पूछता हूं। फिर रोना शुरू होता है तो मेज पर दोनों हाथों से सिर छुपाकर कई देर तक रोते रहता हूं। ‘ सर क्यों रो रहे हो ’ टीना मोहन की आवाज आती है। वह घबराकर राणा जी, शैलेश, अनुज्ञा, सेमवाल, बहुगुणा जी और पाण्डे जी को बुला लाती है।

अगली सुबह ऋषिकेश से 4 बजे गांव की ओर चल पड़े। जीप में परिवार के और लोग भी हैं। वीरान सड़क पर जीप की रफतार कुछ ज्यादा है। गांव पहंुचने की जल्दी हम सबको है, इसलिए गाड़ी की तेज रतार को सभी नजर अंदाज कर रहे हैं। हर कोई खामोश है पर सभी एक ही दिशा में सोच रहे हैं। स्मृतियां एकाएक बचपन के चौखट पर पहुंच गई। जन्दरे (अनाज पीसने वाली छोटी चक्की) की आवाज से भोर में नींद टूटी तो सीधे जन्दरा चलाती मां के घुटनों में फिर से सो गए। जन्दरे की भरभराट के साथ मां कोई लोकगीत या भजन हल्के से गुनगुनाती। वह गूंज आज भी कानों में तरोताजा है।

बचपन में मां से सुनी गोपीचंद और भतृहरि की वैरागी धुन में गाया नाथपंथी लोकगीत अक्सर याद आता है। 
'ऋद्धि को सुमिरों सिद्ध को सुमिरों, सुमिरों शारदा माई,..... अमर नि रैंदा चंद-सुरज चुचा, मेघ घिरे छिप जाई, .... 
कागज पत्री सब कुछ बांचें, करम नि बांचें कोई'....
सुन रे बेटा गोपीचंद.......

श्रीकृष्णकथा में श्रीकृष्ण का पाताललोक में जाने का प्रसंग जब वह गाकर सुनाती तो गहरी नींद में भी मन हिलोरें लेने लगता। बासुकी नागदेवता तब डरावना नहीं लगता और उसकी रानियां रंगबिरंगी मछलियां सी लगती। उसकी सुबह बहुत तड़के हो जाती है। पूरे परिवार में मां अकेली ही काम करने वाली है, हम बच्चे जो ठहरे। दादा जी बुर्जुग पर काम -धन्धों को समय पर करने वाले हुये। आठ भाई-बहिनों में ऊपर के पांच (चार भाई और एक दीदी) पिताजी के साथ देश (रुद्रप्रयाग) में पढ़ रहे है। गांव में हम तीन (दो बहिनें एक मैं) मां के साथ हैं। मुझसे बड़ी बहिन की उम्र स्कूल जाने की है। छोटे भाई-बहिन की देखभाल की जिम्मेदारी के कारण वह स्कूल में विगत दो सालों से भर्ती नहीं हो पाई है। थोड़ा बड़े हुए तो हम अपनी-अपनी भरसक से मां के साथ कामों में हाथ बंटाते। स्कूल जाने से पहले गोबर खेत में डाल आए तो वापसी में खेत से लकड़ी-अनाज ले आए। हमारी पढ़ाई के प्रति वह बहुत सचेत हैं। रसोई में मां खाना बना रही है तो कोयले से गिनती-पहाड़े पर उसने हमको जुटाया है। मास्टर जी जब छुट्टियों में अपने गांव से आते-जाते हैं तो रात को हमारे घर ही रुकते हैं। रिश्तेदारी जो ठहरी। स्कूल में होने वाली हमारी हर गतिविधियों की खबर मां को है।

रुउली में हमारे खेत में गोठ लगी है। शाम का अन्धेरा हो गया। गोठियों के लिए तम्बाकू की पिण्डी पहुंचानी है। मैं 6-7 साल का छज्जे पर खड़ी मां की आवाज के सहारे-सहारे लगभग एक किलोमीटर दूर गदेरे के पार रिउली पिण्डी पहुंचा आता हूं। मां मंत्र विद्या में निपुण है, इसीलिए सुबह हो या शाम गांव के आस-पास की कई महिलाएं उसे घेरे रहती हैं। किसी की गाय दूध नहीं दे रही है, तो किसी का नाती दूध नहीं पी रहा। वह पुडि़या की राख को अंगुलियों से छूते हुए मंत्र बुदबुदाती, हम सुनने की कोशिश करते पर नाकाम। अगले दिन सुनाई देता कि हे राजू ब्वे (राजू की मां) खूब ह्वैग्या नाती या गाय का दूध कुछ बढ़ गया है। थाड़ (गांव का सार्वजनिक स्थल) में होली के नाच-गाने हो रहे हेैं। बीच थाड़ में होली जली कि गांव के सयाने पुरूष परे हो गए। अब केवल हम बच्चे और महिलाएं ही हैं। थड्यां, चैंफला, खुदेड़ी सामूहिक लोकगीत-नृत्यों का कार्यक्रम देर रात तक चलता है। मां की उसमें बढ़-चढ़कर भागीदारी है। शादी-ब्याह में वह सबकी पसंद की मांगलेर (मांगल गीत गाने वाली) है। जड़ी -बूटियों की उसको जबरदस्त पहचान है।

एक कुशल वैद्य के रूप में उसकी ख्याति दूर-दूर तक है। गांव की दो-तीन महिलाओं में वो भी शामिल है, जिन्हें चिट्ठी -पत्री लिखनी-पढ़नी आती है। मां बताती कि यह कौशल उसने अपने दादा जी से सीखा। वह एक कुशल दाई भी है। याद आ रहा है हमारे घर के चैक में एक बुर्जुग अपनी टोपी निकाल मां से विनती कर रहे हैं कि ‘ ब्वारी तुमरु ही भरूसु च ’ (बहू तुम्हारा ही भरोसा है)। बात यह है कि उनकी बहू का प्रसव होने वाला है, उनको डर है कि कहीं दूर गांव समझ के मां आने से मना न कर दे। मुझे अभिमान होता कि मेरी मां बहुगुणी है। दादा जी मां से खुश रहते और घर के काम-काज में भरपूर सहयोग देते। मां शाम को खेत से आई नहीं कि लोटे में चाय भरकर मुझे मां को देने के लिए थमा देते। सब्जी काट कर व चटनी का सामान मां के आने से पहले रसोई की देहली पर रख देते। आम पहाड़ी नौकरीपेशा वाले परिवारों की तरह हम भी कुछ वर्षों के बाद पिताजी के साथ गांव से बाहर रहने लगे। मां की बीमारी तथा हमारी पढ़ाई-लिखाई मुख्य कारण रहा होगा। गांव छोड़ने का दिन याद हैै। गाड़ी में बैठने की खुशी में मेरे और छोटी बहिन के पैर जमीन पर नहीं थे। पर मां गमगीन थी, घर के दरवाजे पर सांकल चढ़ायी (तब घरों पर ताला लगाने का रिवाज नहीं था) तोे उसकी रूलाई फूट पड़ी। अपनी बाछी को छोड़ कर जाना, मुझे भी रूला गया। घर छूटने का दर्द आज समझ में आ रहा है। रुद्रप्रयाग, जोशीमठ, काशीपुर, टिहरी, अल्मोड़ा उत्तरकाशी और बड़कोट में सब मिलाकर 14 साल का उसका गांव से प्रवास रहा। पिताजी के सन् 1980 में सरकारी सेवा से अवकाश के बाद फिर से उसका गांव का जीवन शुरू हुआ। आज 27 साल के इस आनन्दमयी जीवन को विराम लगा।

चामी की धार चमधार में पहुंचते ही हमारे घर से आने वाले सामुहिक रुदन का स्वर हमें और विचलित करते है। घर-गाॅव की लोगों से घिरी मां की निःचेष्ट देह। मैं चेहरे पर हाथ लगाता हूं। बर्फ सा ठण्डा, बिल्कुल शान्त कोई शिकन नहीं, झुर्रियां एकदम गायब, सबको निहारती हुयी, बच्चे जैसा चेहरा, इतनी छोटी क्यों लग रही होगी ? मन हुआ गोद में उठा लूं। बंद होंठो में हल्की सी मुस्कराहट मानों कह रही हो, ‘ मी त चल ग्यूं, खूब राजी खुशी रयां तुम सब ’ (मैं तो चली गयी, तुम सब राजी खुशी रहना)। हम सब भाई-बहिनें उसे घेरे हुए रोते-रोते मानों कह रहे हों ”खाणू बणौ भौत भूख लग्यीं चा’ (खाना बना बहुत भूख लगी है)। गांव की एक भाभी कहती है ‘ जी त भग्यान ह्वै गैन। किलै रूणा छों। किलमजात भर्यूं-पूरयों परिवार छः तुम्हरो, खूब सेवा पाणी कार तुमन। कमि नि करी। अर अब ब्वे कैकि राय सदनि ’ (सास जी तो भाग्यवान हो गई हैं। क्यों रो रहे हो। भरा-पूरा परिवार है तुम्हारा। तुम सबने उनकी बहुत सेवा की। कोई कमी नहीं की। अब मां किसकी रही हमेशा)। कमरे में बढ़ती भीड़ के कारण बाहर आना पड़ा। छज्जे में टीनू खड़ा है। एकटक नीचे चैक में अर्थी बनते हुए देख रहा हैं, उसके चेहरे पर कई भाव आ-जा रहे हैं। मैं कहता हूँ दादी चली गई बेटा, पर वह मुझसे ज्यादा समझदार है, पता है, कह कर अपनी मां के पास चला जाता है। घर के चैक में लोगों की बढ़ती आवाजाही में कई बातें सुनाई दे रही है। ‘सभि भै-वैण्यां ऐगिन अब क्यांकी देर च। क्वी कष्ट नि ह्वे फूफू तैं प्राण जाण मां चुपचाप स्वां सरक ग्या। उम्र भी ह्वै ग्यै छें। कु जीणूं च 85 साल अजकाल। जब तलक अपणा हाथ-खुट्यां चलणा छन तब तक जीणूं भलो। वैकां बाद बै मतलब की खेच्यां-तांड़ी ही चा’ (सभी भाई-बहिनें आ गई हैं। अब देर किस बात की। कोई कष्ट नहीं हुआ फूफू को प्राण जाने में। चुपचाप चली गई। उम्र भी हो गई थी। कौन जीवित रह रहा है आजकल 85 साल। जब तक अपने हाथ-पांव चल रहे हैं तब तक जीना भला। उसके बात तो बिना बात की खींचा-तानी ही है)। दूसरे कई गांवों में खबर पहुंचा दी है इसीलिए पिताजी का मन है कि कुछ देर और रुक कर उनको भी आने दें। पिताजी ने बहुत विनीत स्वर में कहा, तो एकाएक मेरा ध्यान उनकी तरफ गया। एकटक पिताजी को देखता हूं, उनको इतना नम्र, उदास एवं कमजोर मैंने जीवन में पहली बार देखा। अपने परिवार के पंडितजी को खबर हुई क्या ? मै पूछता हूं। अरे भाई, आज पंडितजी का क्या काम ? फिर हम सब पंडित ही तो हैं, निपटा लेंगे, बहुत हल्के ढंग से किसी ने जवाब दिया। क्यों पूछा होगा मेरे मन में आया।

ठीक दस बजे मां के पार्थिव शरीर को पिंकू, टुन्नू, थौली और टीनू कन्धा देते हैं। टीनू का कंधा नहीं पहुंचा तो हाथ लगाकर ही सबसे आगे चल रहा है। ‘ हे जि बड़ा भाग छाया तुमरा नाती-पौथ्यां क कधों म छवां जाणा। कन क्वै रौला हम तुमर बिन। कन रैंदा छाया छज्जा म बैठ्यां तुम (बड़े भाग थे तुम्हारे जो नाती-पोतों के कंधों में जा रही हो। कैसे रहेंगे हम तुम्हारे बिना ? कैसे रहते थे तुम छज्जें में? ’ महिलाओं का विलाप गांव से बहुत दूर तक सुनाई देता है। तल्ली चामी की महिलाएं रास्ते में मिलती हैं। तल्ली चामी हमारा ननिहाल यानि मां का मैत है। नानी के घर के सामने थोड़ा रुकते हैं। गांव के नीचे की सड़क से अर्थी को जीप में ले जाना है। मन हुआ कि कहूं हम कन्धे पर ही ले जा लेंगे पर आम सहमति के बीच चुप रहना बेहतर समझा। तभी पीछे से आवाज आयी डैडबाडी को छत पर चढ़ाओ। मैं चैंका, सांसरिक रिश्ते इतनी जल्दी गल जाते हैं। प्राण गए तो शरीर डैडबाडी हो गया, उसके साथ सम्बन्धों के सम्बोधन भी खत्म हो गए। संवेदनाओं का सूखापन हमारे जनजीवन में इस कदर पसर गया है इसका नजदीकी आभास आज हुआ। अधिकांश लोग लकड़ी ले जाने वाली जीपों में ठूंसकर जा रहे हैं। हम कुछ ही लोग पैदल हैं। चारों तरफ नजर दौडा़ता हूॅ। समय पर पानी नहीं बरसा तो खेती चौपट, जगह-जगह जानवर खेतों में आराम से बची-खुची घासनुमा फसल चर रहे हैं। फरवरी का महीना और चारों ओर सूखापन। प्रकृति में भी और लोगों में भी। मोटर सड़क से नीचे का पैदल रास्ता झाडि़यों से रूका हुआ है। आगे जाने वाले लोग पहले झााडि़यों को हटा रहे हैं, तब बड़ी मुश्किल से एक-एक कर लोग चल पा रहे हैं। कभी यह रास्ता दिन-रात लोगों के आवागमन के कारण दुरुस्त रहता था। इसके दोनों ओर खेती-बाड़ी हुआ करती थी। आम के पेड़ इस तरफ बहुत थे। नयार -नदी पार करके पाटीसैंण पहुंचने के लिए यही रास्ता सुविधाजनक था। आज हालत यह है कि गांव के बड़े बुजुर्गों को भी रास्ता ढूंढने में दिक्कत हो रही है। मोटर सड़क आने से इस रास्ते में पैदल चलना बंद हो गया। इस ओर कोई खेती-बाड़ी भी नहीं करता है। अब साल-छः महीने में मुर्दाफरोशी में ही इसका इस्तेमाल होता है। विडम्बना यह है कि गांव की ओर मोटर सडक तो आई पर उसने गांव के रास्तों पगडंडियों को वीरान कर उनके अस्तित्व को ही मिटा दिया है। सच तो यह है कि सड़क को गांव तक पहुंचना था पर हुआ यह कि गांव ही सड़क पर आ गए हैं। सड़क के किनारे दोनों ओर तेजी से बनते आगे दुकान-पीछे मकान या फिर नीचे दुकान-ऊपर मकान की प्रवृत्ति तो यही संकेत दे रहे है।

मैं याद करता हूं, इससे पहले इस घाट पर 32 साल पहले मई 1975 में नाना जी के देहान्त पर आया था। चबूतरे के बीच में फैला आम का पेड़ अब विशालकाय हो गया है। पूर्वजों का बनाया यह चबूतरा समय के साथ बूढ़ा नजर आता है। मां अक्सर बताती थी कि जब यह चबूतरा बन रहा था तो वह बनाने वालों के लिए रोज नाश्ता लेकर आती थी। बौंसाल में जब नयार नदी पर पैदल पुल का निर्माण इलाके के लोग कर रहे थे तब भी काम-काजियों के लिए रोटी लाना उसके जैसी गांव की तीन-चार बहुओं के जिम्मे रहा। उतार-चढ़ाव का 3 कि.मी. का यह रास्ता नापना तब उनके लिए रोज के काम का एक छोटा सा हिस्सा ही था। आज उसी जगह उसकी जीवन यात्रा को पूर्ण विराम दिया जा रहा है। चिता पर मां का शांत शरीर है। चारों तरफ से लकड़ी के सूखे गठ्ठों से वह ढक चुकी है। मैं नजदीक जाकर बस एक बार देखना चाहता हूं। पर अब भाग्य में नहीं। महेन्द्र, लालू, लाटा, सुनील एवं नकुल चिता बनाने में अनुभवी लोगों की तरह जुटे हैं। बुजुर्गों की टोका-टोकी भी उनके लिए जारी है। किस लकड़ी को चिता के किस तरफ रखना है, इसके लिए तर्क-वितर्क होना जरूरी है। यही लोक विज्ञान है, जो कई पीढि़यों के अनुभवों से विकसित होता हैं। विद्या भाई बताते हैं कि बारिश के समय तुंगा के पत्तों से पहले चिता की लकडि़यों को सुखाया जाता है तब फिर कुछ ही देर में धुएं के साथ भक्क से आग लगती है। साफ-सुथरा घाट, नयार का शुद्व पानी, एकान्त जगह, हरिद्वार क्यों ले जाते होंगे? वहां के घाटों की गंदगी तथा पंडों की लूट का ख्याल अचानक आता है। भाईयों में सबसे छोटा हूॅं इसलिए चिता पर आग लगाने का दायित्व मुझे मिला है। चिता की आग एक अलग तरह का भाव पैदा करती है। यह आग अकेलेपन का आभास कराते हुए कुछ देर के लिए आदमी के मन को वैरागी रंग की चादर पहना देती है। मां की अनगिनत स्मृतियां आखों में है। अपने को नियंत्रित करने के लिए घाट पर उपस्थित लोगों को गिनता हूं 60 से ऊपर है।

विधानसभा चुनाव के मतगणना का दिन है। इसलिए सारी बहस राजनीति पर केन्द्रित है। किसकी सरकार बनेगी पर सबके अपने-अपने मजबूत दावे हैं। चिता की आग की गर्मी में अब तेजी है। मैं पीठ करके बैठता हूं तो पीठ पर गजब का सेक लगता है। कपाल क्रिया के बाद बाल काटने की शुरूआत हुई तो सभी नई ब्लेड नकली निकलीं। नकली माल का सबसे बड़ा बाजार पहाड़ ही है। जो चाहे, जैसा चाहो, बेचो कोई पूछने वाला नहीं। सिर मुंडाने के बाद हम पांचों भाई एक साथ गोल घेरे में बैठते हैं। पिकूं का रोना अभी तक जारी है। मुझे लगता है, हम सब भाई बुजुर्गों की कतार में आ गए हैं। नरेन्द्र भाई के सिर की चोट के निशान गिनता हूं पूरी दस हैं कब, क्यूं, कैसे हम सबने मां की मार खाई का खुलासा करके हम मन को हल्का कर रहे हैें।

चिता शांत करके नयार नदी के पार मोटर सड़क के किनारे मैटाकुण्ड के ढाबे में भोजन पर सभी टूट पड़े। घाट से आने पर भूख ज्यादा लगती है बल। चुनाव नतीजे आने लगे हैं। वोटों की गणित के नफे-नुकसान की चर्चा जोरों पर है। घर पहुंचने पर सभी चैक में बैठते हैं। घर के बच्चे सबके गंजे सिर देखकर हंसते हैं। घर के अन्दर से लगा मां की आवाज आई, ‘ कख वटि आणा छवां रै (कहां से आ रहे हो)'। कैसे कहें कहां गए थे ? मां के कमरे में जमीन पर लेटता हूं। तभी बाहर जोरों की बारिश आनी शुरू हुई। गांव की भाभी कहती है ‘ जी यीं बरखा मां सीधा वैतरणी पहुंच ग्यै हौला ’ (सास जी इस बारिश में सीधे वैतरणी पहुंच गई होंगी)।

 

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