धूमा दीदी का जन-संघर्ष

अरुण कुकसाल

जन-संघर्षों की अग्रणी धूमा दीदी का कहना है कि 'उत्तराखंड की राजधानी का अरुणोदय तो गैरसैंण में ही होगा, वु कुछ भी कर ल्या।'

‘भुला, बहुत साल पहले (वर्ष 1997) जब हम उप्र में थे तो बद्रीनाथ जाते हुए उस समय के राज्यपाल मोती लाल बोरा जी गैरसैंण में रुके थे। वो पहाड़ के विकास की बात करने लगे तो मैंने कहा कि आप पहाड़ में एक शराब की दुकान तो बंद नहीं करा सकते तो फिर पहाड़ का क्या विकास कर पाओगे। आज भी वही स्थिति है। हमारी उत्तराखंड सरकार का घ्यान गैरसैंण राजधानी बनाने के बजाय केवल शराब-बजरी बेचने और अपनी सुख-सुविधायें बढ़ाने पर ही है।’ गैरसैंण धरना स्थल पर बैठी धूमा दीदी राज्य बनने के पूर्व और बाद में सत्ता की नादानियों को मुस्करा-मुस्करा कर बताती जा रही हैं।

धूमा दीदी की उम्र उसी के मुताबिक 3 बीसी और 4 साल याने 64 वर्ष है। घर-परिवार की जिम्मेदारियों के साथ-साथ वर्षों से सामाजिक संघर्षों में उनकी निरन्तर भागेदारी रही है। विगत आन्दोलनों में मिले अनुभवों से वो जानती है कि ‘स्थाई राजधानी गैरसैंण’ के लिए आगे एक लम्बी और कठिन लड़ाई लड़ी जानी है। 111 वें दिन में पहुंचे आन्दोलन में साथी आन्दोलकारियों का हौसला और हिम्मत बना रहे इसके लिए वह घरना स्थल पर दिन-रात सक्रिय रहती हैं। गैरसैंण धरना स्थल अब उनकी जैसी कई और स्थानीय बहिनों और भाईयों के लिए 'घर का आंगन' जैसा हो गया है। जहां दिनभर में बार-बार आना-जाना लगा रहता है। साथ ही रोज के रोज तमाम क्षेत्रों से सर्मथन हेतु आने वाले अपने लोगों की आव-भगत भी करनी होती है। कई अन्य बुजुर्ग महिलाओं के साथ धूमा दीदी आदोलनकारियों की अभिभावक की तरह इसमें भी सर्मथ एवं पारंगत है।

नारायणबगड़ क्षेत्र के 'कनसूला' गांव में धूमा दीदी का मायका है। ‘स्कूल दूर था पर बचपन में मेरी जैसी गांव की कई लड़कियां पढ़ना चाहती थी। मां-बाप कहते तुमको पढ़ाने के बजाय लड़कों को पढ़ायेगें। तुम तो घर-गृहस्थी और खेती-बाड़ी का काम सीखो, बस तुम्हारी शादी तक ही हमारी जिम्मेदारी है। उसके बाद इन्हीं गुणों से तुम्हें खाना-कमाना है। तब भुला, खेत और जंगल ही हमारा स्कूल हुआ जो आज भी है। उस हिसाब से तुमने 16 दर्जे तक पढ़ा होगा और मैने तुमसे ज्यादा 20 दर्जे तक।’ धूमा दीदी बोलते हुए जरूर हंसती जा रही हैं पर उस दौर की बालिकाओं की वेदना को भी बखूबी उद्घाटित करती हुयी लगती है। मात्र 16 साल की उम्र में उनका विवाह गैरसैंण निवासी 40 वर्षीय व्यवसायी हयात सिंह साह जी के साथ हुआ था। पहले से ही शादी-शुदा हयात सिहं पूर्व सैनिक भी थे। साह जी का परिवार आर्थिक सम्पन्नता के साथ-साथ सामाजिक सम्पन्नता के लिए लोकप्रिय रहा है। क्षेत्र के विकास लिए हयात सिंह जी की सक्रियता और लोकप्रियता से सभी वाकिफ हैं।

नब्बे के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में उत्तराखंड क्रान्ति दल गैरसैंण क्षेत्र में प्रभावी भूमिका में था। उस जमाने में बाहर से आने वाले नेतागण अपने स्थानीय कार्यकत्ताओं के घरों पर ही मेहमान बतौर रहा करते थे। तब होटलों में रुकने का रिवाज नहीं था। हयात सिंह साह यूकेड़ी के गैरसैंण ब्लाक अध्यक्ष बने तो तमाम नेताओं का आना-जाना उनके परिवार में बड़ने लगा। उनके घर में सामाजिक और राजनैतिक कार्यकर्ताओं की बैठकें हुआ करती थी। इसका असर यह हुआ कि स्कूली शिक्षा से अनभिज्ञ धूमा दीदी भी समाज की बेहतरी की बात को समझने लगी। विपिन त्रिपाठी और इन्द्रमणि बड़ोनी जो कि प्रायः पहाड़ी में बोला करते थे से वह बहुत प्रभावित हुई। अपने पहाड़ की समस्याओं से निजात पाने के लिए पृथक राज्य बनाने की बात बड़ोनी जी ने ही उन्हें समझाई थी। बड़ोनी जी के कहने पर महिलाओं ने वीर चन्द्र सिंह ‘गढ़वाली’ पर एक पहाड़ी गाना तैयार करके 25 जुलाई, 1992 को ‘गढ़वाली’ जी की गैरसैंण में मूर्ति स्थापना के समय गाया था।

वर्ष 1994 में पृथक राज्य आन्दोलन जो शुरू हुआ तो घूमा दीदी अब पूर्णकालिक सामाजिक कार्यकर्त्ता बन चुकी थी। राज्य आन्दोलन के दौरान वे 8 दिन गोपेश्वर जेल में बंद रही। राज्य आन्दोलन के दौरान गैरसैंण के साथ-साथ कर्णप्रयाग, गोपेश्वर, श्रीनगर, पौड़ी और देहरादून में धरना, प्रर्दशन, अनशन और गिरफ्तारी में उनकी बड़-चढ़कर भूमिका रही। परन्तु राज्य बनने के तुरन्त बाद ही उन्हें अहसास हो गया कि नये सत्ताधारियों से एक लम्बी लड़ाई उनका इंतजार कर रही है। स्थाई राजधानी के मुद्दे पर 'उत्तराखंड महिला मंच' के आवाह्नन को सर्मथन देते हुए 2 अक्टूबर, 2004 को गैरसैंण में डाॅ. उमा भट्ट के साथ धूमा दीदी भी आमरण अनशन पर बैठी। उमा और धूमा का यह अनशन 8 दिन का रहा। वैसे मातृशक्ति का यह धरना 67 दिनों तक चला। राजनैतिक कुचक्रों ने इस 'गैरसैंण स्थाई राजधानी आन्दोलन' को दबा दिया था। उसके बाद के समय-समय के गैरसैंण के आन्दोलनों में धूमा दीदी प्रखर तौर पर मुखर रही हैं। वर्तमान में ’स्थाई राजधानी गैरसैंण’ के लिए वे 9 दिन तक आमरण अनशन पर रही। प्रशासन द्वारा जबरन उनके अनशन को समाप्त किए जाने के बाद वह अन्य अनशनकारियों के सर्मथन में निरंतर हर घड़ी धरना और प्रर्दशन में शामिल रहती हैं।

आज स्थाई राजधानी गैरसैंण आन्दोलन का 112वां दिन है। जीवन रक्षक पदक से सम्मानित पूर्व सैनिक पूरन सिंह मेहरा जी और गोविन्द सिंह बिष्ट जी के आमरण अनशन का चौथा दिन है। विधानसभा सत्र की समाप्ति के कुछ क्षणों बाद ही मंत्री से संतरी तक पूं-पूं बाजा बजाते हुए देहरादून के अपने-अपने दबड़ों में दुबक गए हैं। ऐसे में धूमा दीदी अपने साथियों के साथ फिर से इस लड़ाई को और आक्रमक और निर्णायक बनाने की रणनीति में जुट गए हैं। क्योंकि उन्हें मालूम है कि ‘उत्तराखंड की राजधानी का अरुणोदय तो गैरसैंण में ही होगा, वु कुछ भी कर ल्या।'

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