पेड़ों का बलिदान

कल्याण सिंह रावत "मैती"

हजारों बसंत देख चुके ये देवदार के वृक्ष अब अंतिम सांसे गिन रहे है। आल वेदर रोड के लिए ये अपनी कुर्वानी देने का इंतजार कर रहे हैं।

भागीरथी घाटी की सुरम्यता इन्ही घने देवदार के वनों की बजह से हैं। इन्ही देवदार बनो का जादू था कि विल्सन जैसा कर्मयोगी अंग्रेज इस घाटी का दामाद बन बैठा। राजकपूर यहाँ की प्रकृति पर इतना मन्त्र मुग्ध हुवा की महीनों तक हरसिल की वादियों में कैमरा घुमाता रहा। आज आल वेदर रोड के नाम पर इन खुबसूरत देवदार के हजारो पेड़ धरासाही होंगे। गंगोत्री तक बारह मी0 चौड़ी रोड पंहुचेगी। याने बारह महीने गंगा मैया के दर्शन श्रद्धालु कर पायेंगे। गंगोत्री के धाम हमेशा खुले रहेंगे। मुखवा वाले क्या तब अपनी द्याण गंगा को डोली में बैठा कर मैत (मायका) नहीं लायेंगे? क्या बारह महीने गंगा अपने ससुराल में ही अटकी रहेगी। जहाँ हम महिलाओं को उनकी आजादी और अधिकार देने की बात कर रहे हैं तो क्या गंगा मैया के साथ नाइंसाफी नहीं होगी? प्रश्न बहुत है। समाधान भी चाहिए।

पहाड़ के विकाश के लिए अछी पक्की सड़कों का होना बहुत जरूरी है। सड़कें पक्की हों, बाधा रहित हों हर कोई पहाड़ वासी चाहता है। यदि हम अपने जैविक उत्पादों को अच्छी हालत में तुरंत बड़ी मंडियों तक समय से पंहुचाना चाहते हैं तो सडकें चौड़ी और बाधारहित होनी आवश्यक हैं। यदि हम इस प्रदेश को पर्यटन प्रदेश के रूप में विकसित करना चाहते हैं तो बाधारहित पक्की सडको का होना आवश्यक है, ताकि लोग आसानी से पहाड़ों के पर्यटक स्थलों के दीदार हो सकेंगे। स्वास्थ्य सेवाओं को चुस्त दुरस्त बनाने के लिए भी अच्छी सड़कों की नितांत आवश्यकता होती है।

आल वेद्हर रोड का सबसे बड़ा उपयोग सामरिक महत्व का है। सीमांत जनपद उत्तरकाशी, चमोली तथा पिथोरागढ़ के सीमान्त से लगे क्षेत्रो तक सामरिक सामग्री पहुँचाने तथा देश की सीमाओं की सुरक्षा को मजबूत बनाने में बाधा रहित पक्की सड़कों का बड़ा महत्व है। हम इस बात को भी नजरंदाज नहीं कर सकते कि जहा चीन ने हिमालय के पार सड़कों का जाल बिछा दिया हो वहां हम हाथ पर हाथ धर कर नहीं रह सकते। ऐसी स्थिति में हमें आल वेदर रोड के अलावा और बिकल्प भी तलासने होंगे और तुरत गति से उन पर कार्य करना होगा। अब रही बात कटे पेड़ों की भरपाई का। उच्च हिमालयी क्षेत्रो में सड़क की चौड़ाई कम से कम दो मीटर कम कर देनी चाहिए इससे पेड़ कम कटेंगे। शीत काल में सड़क कितनी भी चौड़ी हो बर्फवारी के चलते बंद ही रहेंगे। ऐसी स्थिति में हमें सड़क खोलने में अत्याधुनिक मशीनों का प्रयोग सड़क खोलने में करना ही पड़ेगा। इसलिए अच्छा यह हो की सड़क की चौड़ाई घटा कर हर 5 की मी के अन्तराल पर जे सी बी जैसी मशीनों की ब्यवस्था 24 घंटे सुनिश्चित करनी चाहिए। कटे हुए पेड़ों के एवज में 10 पेड़ प्रति पेड़ के हिसाब से उसी प्रजाति के पेड़ों का रोपण किया जाना आवश्यक है। पेडो का रोपण उसी क्षेत्र में किया जाना उचित होगा जहाँ पेड़ काटे गए हैं। उस क्षेत्र में जितने पेड़ कटे हैं उन पेड़ों की वास्तविक मूल्यों के बराबर पैसा उस क्षेत्र के पर्यावरणीय संबर्धन के क्रियाकलापों में खर्च किया जाना उचित होगा। इसके लिए एक जन कोष बनाया जा सकता है। आल वेदर रोड में कटे पेड़ो के एवज में जो पेड लगाने की योजना बने उसमें स्थानीय जन प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिए। आल वेदर रोड के नाम पर जो पेड़ लगें, उनकी स्थिति, संख्या,प्रजाति, सुरक्षा की योजना के साथ साथ कार्य दाई संस्था का नाम सार्वजनिक किया जाना चाहिए। प्रति वर्ष इन लगाये गए पेड़ों की मोनिटरिंग के लिए जनता के बीच से जानकारों व अवकाशप्राप्त बिशेसज्ञों की टीम गठित की जानी चाहिए। हमारे पूर्वजों की धरोहर जो उन्होंने खूबसूरत जंगल बना कर हमें सौंपे थे उनकी यह बहुमूल्य अमानत हमें अगली पीढ़ी को भी सौंपनी है। इसके लिए हमें सदैव तत्पर रहना होगा।

लेखक मैती आन्दोलन के जनक हैं.

चैनल माउन्टेन, मीडिया के क्षेत्र मैं काम करने वाली एक अग्रणी एवं स्वायत्त संस्था है . जो की पिछले 21 सालों से सतत कार्यरत है.

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