दत्ताखेत-राजपथ का पड़ाव

अरुण कुकसाल

शताब्दी पूर्व गढ़वाल-कुमांयू राजपथ का प्रमुख पड़ाव दत्ताखेत कभी था गुलजार था आज वीरान है.

जीवन हमेशा जीवन्त नहीं रहता। कभी चहल-पहल और कभी सूनापन उसके अनिवार्य हिस्से हैं। फिर जीवन चाहे आदमी का हो या फिर किसी स्थान विशेष का। पर यह भी महत्वपूर्ण है कि प्रकृति प्रदत उनकी मौलिक अहमियत और खूबसूरती सदैव बरकरार रहती है। पौड़ी-श्रीनगर-खिर्सू त्रिकोण के ठीक बीच में चुपचाप अपने शानदार अतीत में खोया-सिमटा दत्ताखेत मुझे इसी नज़र और कारण से खुश और संतुष्ट दिखा। अब ये बात और है कि 16 फरवरी, 2018 के दिन अचानक सौ से ज्यादा आदमियों (एनआईटी हेतु भूमि चयन वार्ता के लिए आये लोग) की उपस्थिति से उस दिन इस जगह की नीरवता अचानक भंग हुई हो।

चारों ओर घने जंगलों से घिरा दो पहाड़ों का संधि स्थल दत्ताखेत की समुद्रतल से ऊंचाई 1650 मी. के करीब है। किंवदंती है कि ऋषि दत्तात्रेय की तपस्थली होने के कारण इस स्थल का नाम दत्ताखेत पड़ा। दत्तात्रेय के तपस्या स्थल की पाषाण शिला पर कुछ वित्तचित्र और आकृतियां हैं। नजदीकी गांवों के लोग बार-त्योहार में इस जगह पर पूजा के लिए आते हैं। दत्ताखेत को शिवभूमि भी माना गया है। यह क्षेत्र बाघ का भी प्रिय है। दत्ताखेत का बाघ अक्सर चर्चाओं में रहता है। वर्तमान में जलेथा ग्रामसभा का तोक गांव दत्ताखेत में दो आवासीय भवन, एक जूनियर हाईस्कूल और दो चाय-नाश्ते-भोजन की दुकानें हैं। श्रीनगर और पौड़ी से आने-जाने वाली गाड़ियां यहां विश्राम लेती हैं। निखालिश गांव के दूध की चाय, पहाड़ी चावल-दाल का भात-दाल और नींबू का टफ्किया (चटनी) का आनंद जो यहां मिलता है। दत्ताखेत से पौड़ी- 30, खिर्सू-17, श्रीनगर-17, देवलगढ़-10 और बुघाणी-3 किमी. दूरी पर स्थित है।

दत्ताखेत के आस-पास लम्बे-चौडे़ खेतों की निशानियां इस बात की गवाह हैं कि कभी यह इलाका भरपूर खेती से आबाद रहा होगा। यहां के खंडहर भवनों के कंकाल कभी सरायनुमा दुकानें थीं। टिहरी, श्रीनगर, राठ, सल्ट, गैरसैंण, अल्मोड़ा, वीरोंखाल, रामनगर आने-जाने वालों के लिए कुछ देर के ये ठौर हुआ करते थे। चारों दिशाओं से यहां पहुंचने वाली पुरातन पगडंड़ियों के अवशेषों पर असंख्य मानवों-पशुओं के चलने के अहसास और पदचापों को दत्ताखेत की हवाओं में आज भी महसूस किया जा सकता है। तब गढ़वाल-कुमायूं के जनजीवन के किस्से-कहानियों की कछेड़ी इसे कहा जाता था। रोज सैकड़ों की तादाद में दिन-रात के पैदल राहगीरों तथा उनके साथ चलने वाले पशुओं से यह गुलजार रहता था।

टिहरी रियासत और उससे पहले श्रीनगर राज्य से कुमाऊं की ओर जाने वाला राजपथ का यह मुख्य पड़ाव था। यह राजपथ टिहरी, पौखाल, डांगचौरा, कीर्तिनगर, ऐंठाणा, खोला, डिकलगांव, सरणा, हरकंडी, घिरडीधार-जलेथा, दत्ताखेत, मैलचौंरी, खिर्सू, चौबट्टा, मूसागली, चाकीसैंण, सैंजी, बुरांसी, मुसैटी, टकरौली, विनसर महादेव, सल्ट महादेव, गैरसैंण से अल्मोड़ा और चाकीसैंण से बैजरों होते हुए रामनगर से इस राजपथ पर आवा-जाही लगी रहती थी। इन पैदल राहगीरों में, यात्री, व्यापारी, राजकर्मी और घुमक्कड़ शामिल रहते थे। बताते हैं कि ज्यादातर गढ़वाल- कुमाऊं के मध्य पालतू जानवरों यथा- गाय, बैल, भैंस, घोड़े, खच्चर, भेड़-बकरियों के व्यापार के लिए इस राजपथ का उपयोग होता था। रामनगर का प्रसिद्ध बैलों की मंडी को आने-जाने का यही मार्ग था। आज इसके नामोनिशान स्थानीय किस्से-कहानियों में ही यदा-कदा सुनाई-दिखाई देते हैं। शोधार्थियों को चाहिए कि वे गढ़वाल-कुमाऊं के पुरातन राजमार्गों में स्थित दत्ताखेत जैसे पड़ावों पर शोध-अध्ययन करके इनके रोचक और गरिमामयी इतिहास को सामने लायें।

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