धूप सेकने पहाड़ आओ

डॉ वीरेन्द्र सिंह बर्त्वाल 

पहाड़ को ठंड का प्रतीक माना जाता है, पर सर्दियों में पहाड़ मैदान से गर्म होते हैं।

दिन में इतना तड़तडा़ घाम कि आपको स्वेटर तक उतारनी पड़ती है। धूप भी साफ और पारदर्शी। ऐसी धूप में दाल-भात, जख्या के तड़के वाले मूली के थिंच्वाणी, गहथ की भरवां रोटी और भांग की चटनी इत्यादि पहाड़ी पकवान छकने का आनंद ही कुछ और है। वह भी सामूहिक तौर पर। हम प्राध्यापक लोग बेसब्री से इंटरवल होने की प्रतीक्षा करते हैं कि कब सहभोज कर सकें। साथ में खाने से स्वाद भी दुगुना हो जाता है, क्योंकि भोजन का संबंध भावना से है। उपासना का संबंध भी भावना से होने के कारण बताते हैं सामूहिक उपासना अधिक फल देती है। साथ खाएं, साथ रहें, हंसें-खेलें और यहाँ रखा ही क्या है! न जाने कब किसका बुलावा आ जाए।

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