हड़तालों का मौसम शुरु

बृज भूषण सिंह रावत 

बरसात का मौसम खत्म होने को है और हड़तालों का मौसम शुरू होने वाला है,

कर्मचारी ताक में हैं, यूँ विगत कई वर्षों से यही सिलसिला है, शासन तथा कर्मचारी संगठनों का टकराव होना भी लाजिमी है, वेतन विसंगति हो या भत्तों की माँग शासन हमेशा से ही संगठनों की मांग पर दोहरी नीति अपनाता रहा है, एक वर्ग विशेष की मांग पूरी होती है तो दूसरे एक समान पदों में विसंगतियाँ पैदा कर दी जाती हैं, दूसरे संगठन भी मुखर होने लगते हैं,  बड़े संगठनों की मांग स्वीकार कर शासन और सरकार फूट डालने का प्रयास करती रही है जबकि अन्त में उसे उनकी मांगों को पूरा करना ही पड़ता है, यदि एक ही शासनादेश सारे विभागों के लिए हो तो हड़ताल की नौबत ही न आए၊ ४५००० करोड़ से अधिक के कर्ज में डूबे प्रदेश का ७५ प्रतिशत पैसा मात्र वेतन देने पर खर्च हो रहा है शेष २५ प्रतिशत में विकास कैसे हो ? रिटायर्ड अफसरों को सरकार पुनर्नियुक्ति देकर न जाने कौन सा विकास कर रही है जो राज्य को डुबो गये वे ही फिर से नियुक्ति पाये जा रहे हैं, यूँ भी राज्य में फटाफट प्रमोशन पाकर कर्मचारी / अधिकारी मजे में हैं, यूपी में LDC रिटायरमेण्ट पर SO तक ही पहुंच पाता है लगता है राज्य का निर्माण केवल अफसरों के विकास के लिए हुआ है၊ हिमालय बचाने की शपथ पंचेश्वर बाँध और आल वैदर रोड की घोषणाओं के बीच हास्यास्पद है, आगे देखें NGT क्या भूमिका निभा पाता है၊ पलायन समाधान समिति व पलायन आयोग के बीच पंचेश्वर बाँध के निर्माण पर गहन चर्चा हो चुकी है अब समझना होगा कि सरकार की मंशा पलायनवादी है या पलायन को रोकना၊ रोजगार, उद्योग, बागवानी आदि से रोजगार की बाट जोह रहे पहाड़वासी किस आशा में रहें၊ पूर्ण बहुमत वाली सरकार को शराब और खनन के अतिरिक्त राजस्व का स्रोत नहीं मिल रहा ऐसे मे योजनाकार, सलाहकारों व अधिकारियों की फौज पर सवाल उठना स्वाभाविक है၊ ऐसे में यदि राजस्व व रोजगार के संसाधन विकसित नहीं किए गये तो हिमालय बचाने की शपथ का कोई अर्थ नहीं रह जायेगा वैसे भी आज की परिस्थिति मे विधानसभाओं का परिसीमन मूल पहाड़ के अस्तित्व को समाप्त करने के लिए काफी होगा, कम जनसंख्या के कारण प्रतिनिधित्व कम होगा तब उत्तराखण्ड राज्य का न तो कोई अर्थ होगा और न ही अस्तित्व၊ इसलिए हड़तालों के प्रदेश में बार बार की हड़तालों पर अंकुश जरूरी है ताकि विकासोन्मुख योजनाएं बनाकर पलायन को रोका जा सके, यदि सरकार हड़ताल समाप्त कराने में सक्षम नहीं तो न्यायालय के माध्यम से निर्णय लेकर प्रदेश के विकास पर ध्यान दें अन्यथा ये सिलसिला थमने वाला नहीं क्योंकि जिन वोटों के लिए सरकारों ने ये बीज बोए उन्हें काटना तो पड़ेगा ???

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