भयमुक्त बुग्याल एवं अन्य कहानियाँ

मनोहर चमोली ‘मनु’

प्रख्यात शिक्षक, संस्कृतिकर्मी, लेखक, लोक चेतना के अध्येता और कथाकार नन्द किशोर हटवाल जी का कहानी संग्रह ! कथाकार नन्द किशोर हटवाल जी का नवीनतम कहानी संग्रह भयमुक्त बुग्याल एवं अन्य कहानियाँ पाठकों के लिए उपलब्ध हो गया है।

इस संग्रह की सभी कहानियां पठनीय हैं। मननीय हैं। वे सवाल उठाती हैं और हमें हमारे लोक जीवन में ले जाती है। पाठकों को पहाड़ के उन सीमान्त गांवों में ले जाती है जहां वाकई असल भारत बसता है। जहां प्रकृति पांव पसारे बैठी है। जहां आदमी आज भी आदमी है। जहां के जीवन में लोक विश्वास हैं तो जीवन दर्शन भी है। वैज्ञानिक नज़रिया भी है। जहां आदमियत है और विचार है। रसूखदारी से अधिक मानवता है। संग्रह की कहानियों में जो सरलता है। अपनापन है। पाठकों के आस-पास का जीवन है। हर कहानी के देशकाल में ले जाने की ताकत कथाकार के पास निहित हसाझा मकान, कबट’, ’पुत्र प्राप्ति’, ’राम जी की लीला’ है।

समय साक्ष्य प्रकाशन, देहरादून से प्रकाशित इस कहानी की किताब का भरपूर स्वागत होना है। यह तय है। मुझे यह कहने में कतई गुरेज नहीं है कि पहाड़ के परिवेश को कहानी में इतनी सजीवता से सहजता से शामिल करना श्री हटवाल जी ही कर सकते हैं। कहानी कल्पना की ईंट पर खड़ी होती होगी। लेकिन समूचे ढांचे को यथार्थ के ताने-बाने में खड़ा करने के लिए लोकजीवन को इतना करीब से देखने के लिए भोगने का अनुभव भी चाहिए। यह सलीका और अनुभव उस सुदूर सीमांत पर्वतीय क्षेत्र में सालों-साल, अनवरत् रहते हुए ही आ सकता है।

दिलचस्प बात यह है कि पहाड़ की इन कहानियों में आंचलिकता के दर्शन ही नहीं होते वह कदम-कदम पर दिखाई देती है। कुछ नहीं बहुत सारे शब्द वाक्यों से हटकर पढ़ें और बोले जाएं तो संभवतः हर दूसरा पाठक बिना सन्दर्भ के उनके भाव और अर्थ को व्यक्त न कर सके। लेकिन संग्रह में वे जहां-जहां आए हैं वे सन्दर्भ के साथ स्वतः ही अपने मायने खोलते हैं। पाठक इन शब्दों को असहज नहीं पाता। वे कहीं रहस्यमयी नहीं लगते।

एक बात यह भी खास हो सकती है कि जिस तरह समूचा भारत भी ग्लोबल होता जा रहा है। गांव-शहर यकसां हो रहे हैं। कलाएं, संस्कृति, खान-पान, पहनावा भी एक-सा हो रहा है तो ऐसे में लोक जीवन और उनके स्वर को बचाए रखने के लिए ऐसी कहानियां भविष्य में ही नहीं अभी से अपनी भाषा और संस्कृति को बचाने की पहल मानी जा सकती है। इस संग्रह को पढ़ते हुए यह विमर्श भी आरम्भ होगा कि ऐसे कितने कथाकार हैं जिन्होंने अपनी माटी की खुशबू अपने लेखन में बरकरार रखी है। ऐसी कितनी रचनाएं हैं जिन्हें पढ़ते हुए उस माटी,उस लोक उस लोक जीवन की यात्रा-सी करते हुए पाठक झूम उठते हों। भाव-विभोर हो उठते हों। पढते-पढ़ते उस गंवई सी हंसी हंसते हों जो वाकई हमें शहरी होने से बचाती है।

इस संग्रह में ‘जै हिन्द’ कहानी पहाड़ी अंचल के सीमांत क्षेत्रों की जटिलताओं का प्रतिबिम्ब है। पहाड़ के साथ सेना के रिश्तों की जीवंत तस्वीर इस कहानी में दिखाई पड़ती है। मजेदार बात यह है कि यह कहानी इस बात का परिचायक है कि पहाड़ के लोग ज़बान को सबसे ज़्यादा तरज़ीह देते हैं। जो कह दिया तो करना होता है। हीरा के मुख से सैनिकों के समक्ष एक वाक्य निकल जाता है-‘‘साब हम कल बकरा मार रहे हैं।’’ यह जानते हुए भी कि खुद उन्होंने दो महीनों से मांस नहीं खाया और एक बकरा मारना हजारों रुपए की क्षति तब और अधिक है जब बकरियों को चराते समय सुबह से शाम हो जाती है और पेट में भूख जोर मारती है। यह कहानी सरल वर्णन से आरंभ होती है और भेड़-बकरियां चराने वालों के जीवन को रेखांकित करती हुई आगे बढ़ती है। वह अपने बारे में, दूसरों के बारे में क्या और कैसा सोचते हैं, यहां सादगी से आया है। इस कहानी की शानदार बात यह है कि संवादों के माध्यम से कहानीकार ने यहां के जीवन का वह पहलू चित्रित किया है जिसे चित्रण के लायक शायद समझा भी नहीं जाता। यही इस कहानी की सफलता भी कही जा सकती है।

कहानीकार इस समय के ऐसे विरले कथाकार हैं जिनकी कहानियों में कहन है। लोक है। पाठक कहानी पढ़ते-पढ़ते सीधे उस परिवेश में पहुंच जाता है जिस परिवेश की कहानी वे लिखते हैं। उन बारीक चीज़ों पर कथाकार की नज़र जाती है,जिन पर आम लेखक लिखना तो दूर देखता भी न हो। लोक जीवन के साथ, हाड़-मांस के मनुष्य ही नहीं पशुओं के जीवन में झांकना कोई नन्द किशोर हटवाल जी से सीखे। इस कहानी में कहन और संवाद के कुछ उदाहरण पढ़िएगा।

कबि कबि पल काटने में जुग लगता है।

भूख ने हीरा पर फिर झपट्टा मारा।

... इन बुग्यालों में इतनी भूख फैली होती है साली कि... जिसकी कोई हद नहीं... । हीरा ने भूख पर चिढ़ निकाली। बचपन में जब भी उसे भूख लगती थी उसकी माँ भूख को कोसती। पानी ही ऐसी चीज है जिसे माँगने में संकोच नहीं होता। ‘‘अरे रक्षक तो आप लोग हो भाई ...जो सीमाओं की चैकसी करते हैं। असली रेकी तो तुम करते हो। तुमारा सहारा नहो तो हम भी क्या कर पायेंगे।’’ भादो खत्म होने को था। दो-चार दिन से मौसम साफ चल रहा था। दिन में चटक धूप लगती। पर धूप छुपते ही सरसराती हवा चलने लगती। सौदा घाटे का है पर जुबान निकल गई! जुबान भी कोई चीज होती है। बिस देना बिस्वास नहीं। एक बाप की एक जुबान, सौ बाप की सौ जुबान। जो बोल दिया सो बोल दिया। मरद की जुबान...। ‘‘ये बात तो ठीक है!कि जुबान निकल गई तो निभानी है।’’ मंगल ने कहा।

एक और रोचक कहानी इस संग्रह में है। ‘भयमुक्त बुग्याल की कहानी’ की कथावस्तु भी उस क्षेत्र को आधार बनाकर सामने आई है, जहां से नायाब कहानी का सोचा जाना सामान्य बात नहीं। पहाड़ में हरे-भरे चारागाह जहां हरी घास किसी मखमली चादर से कम प्रतीत नहीं होती। चार हजार मीटर के आस-पास पाए जाने वाले बुग्यालों में चरने जाने वाले मेड़,लगोठे,भेड़ें खोह में रहने वाले भेड़ियों के शिकार हो जाते हैं। एक साल की गहन तैयारी के बाद चैबीस घंटे बाद भेड़ियों की खोह पर आक्रमण होने वाला था। ऐसी तैयारी की गई थी कि किसी भी दशा में भेड़ियों त्रिस्तरीय एकजुटता भरे आक्रमण से बचने वाले नहीं थे। वह भी जिन्दा पकड़ने की तैयारी थी। मक़सद था कि भेड़िये मजबूर होकर बेहद सुन्दर और हष्ट-पुष्ट चारागाह को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ दें। फिर भेड़े,लगोठे और मेढ़े ताउम्र बुग्याल की हरी और मखमली घास चरने के लिए स्वतंत्र हो जाएंगे। भेड़ियों को यह बात पता चली तो वे बेहद परेशान हो गए। मरता क्या न करता। इसी आधार पर उन्होंने खूब सोचा और ऐसी तरकीब निकाली कि उस बुग्याल की हरी-हरी घास में चरने वाली सैकड़ों भेड़-बकरियाँ आज भी और कमजोर पड़ती जा रही हैं। इस कहानी के रोचक अंश आप भी पढ़िए-

‘भेड़ियों को अपने जासूसों से सारी योजना का पता चल गया। भय और आंतक से भेड़ियों की खोह में मुर्दानगी छा गयी। एक उपाय था कि जान बचाकर भाग चलें। लेकिन इतने सुन्दर बुग्याल को छोड़कर भागना उन्हें मरने जैसा पीड़ाजनक लग रहा था। इस बुग्याल की तरफ भेड़-बकरियाँ बहुत आकर्षित होती थीं। इसके बीच में भेड़ियों की एक बड़ी खोह थी। भेड़ियों को बिना ज्यादा परिश्रम के शिकार मिल जाया करता था। लेकिन अब वे खुद भेड़-बकरियों के शिकार हो जायेंगे। इतनी भेड़-बकरियाँ! इनका हजारवाँ हिस्सा भी हमसे लड़ने आये तो हमारी बोटी-बोटी न मिलेगी।‘

‘भेड़ की खाल पहने भेड़िये ने देखा भेड़ों का मनोबल सातवें आसमान पर था। भेड़ियों की सबसे ज्यादा शिकार भेडे़ं ही बनती थीं इसलिए भयमुक्त बुग्याल की कल्पना मात्र से ही उन्हें आनन्द आ रहा था। उसके लिए वे कुछ भी बलिदान करने को तैयार थीं। सब कल की तैयारी में जुटी थीं। उचित मौका देख खाल पहना भेड़िया एक ऊँचे पत्थर पर चढ़ गया और कहने लगा, “दोस्तो! कल का दिन सबके लिए मुबारक! भेड़ियों की अन्तिम घड़ी आ गयी है। और हमें कल शाम इसी समय भयमुक्त बुग्याल की प्राप्ति हो जायेगी लेकिन दोस्तो किसी भेड़ ने इसके बारे में कुछ सोचा भी है?”

“कैसा सोचना? ये योजना दो साल में बनकर तैयार हुई है। दसियों बार अभ्यास हो चुका है। एक-एक पहलू पर पचासों बार सोचा जा चुका है। अब फिर कैसा सोचना?”
“मैं योजना की नहीं, हमारी अपनी बात कर रहा हूँ। भेड़ों की। हमने ऐसा सोचा है कि इस समूचे युद्ध में भेड़ों की स्थिति क्या है?”
“अलग से भेड़ों की स्थिति के बारे में क्या सोचने की बात कर रहे हो तुम?”, एक उत्साही भेड़ ने कड़ककर कहा।‘ 
“इसी को कहते हैं भेड़ चाल। दुनिया में हम बदनाम इसीलिए हैं। न सोचना, न समझना, कूद पड़ना गड्ढे में। जरा सोचो, अगर भेड़िये उछलकर हम भेड़ों के बीच गिरे तो क्या हम अकेले अपनी रक्षा कर पायेंगे?”
‘‘यही भेदभाव घेरा बनाने में भी किया गया है। कहा गया है कि घेरे की अग्रिम पक्ति में सिर्फ घुमावदार सींगोंवाले मेढ़े ही रहेंगे। उनके पीछे छह-छह लगोठे। और हम भेड़ें यहाँ भी सबसे पीछे। अब आप सोचिए कि अगर ये जीत हुई भी तो इसमें हम कहाँ पर हैं? और हम कहीं नहीं तो आप ये मानते हैं कि विजय का सुख ये मेढे़ और लगोठे हमें भी भोगने देंगे?”‘‘

‘मेढ़े की खाल पहने भेड़िया मेढ़ों से कह रहा था, “खोह में लड़ेंगे हम और सारी घास चर जायेंगी ये भेड़ें। घेरे में अग्रिम पंक्ति पर लड़ने के लिए हमें खड़ा किया गया है। जरा सोचिए यदि भेड़ियों की संख्या हमारे अनुमान से ज्यादा हुई और वे हम पर टूट पड़े तो क्या हम बच पायेंगे? ऐन वक्त पर लगोठे और भेड़ें मदद करने से मुकर गये तो? एक पल में हम सारे के सारे मारे जायेंगे। इस स्थिति के बारे में भी सोचा है हमने? अगर हम अपना बलिदान कर भेड़िये खदेड़ने में कामयाब भी हुए तो आने वाले समय में इस बुग्याल की घास पर सबका बराबर अधिकार होगा ना? हमें कोई ज्यादा तो नहीं मिलेगा? फिर हमें ज्यादा क्यों लड़ाया जा रहा है? देखना, इन कीड़े-मकोडो की तरह बेशुमार भेड़ों के कारण भयमुक्त बुग्याल की घास एक महीने भी नहीं चलेगी। हमें आज ही ये बात उठानी चाहिए कि बुग्याल प्राप्ति के तुरन्त बाद वहाँ की घास का हममें, लगोठों और भेड़ों में बराबर बँटवारा हो। फिर तो हम उस बुग्याल के एक तिहाई हिस्से में आराम से छह महीने तक पेट भर सकते हैं।’’

प्रति रात्रि भेंड़िये बाहर निकलते तो कोई न कोई मरी हुई भेड़, लगोठा या मेढ़ा उन्हें जरूर मिल जाता। वैसे भेड़ियों को अब इनका ताजा खून पीने में ज्यादा मजा आने लगा था। अन्दरूनी टूटन से कमजोर पड़े हृष्ट-पुष्ट, घुमावदार सींगों के मेढ़ों को बेतहाशा दौड़ाते हुए उनका ताजा खून पीना, चपल लगोठों को चैकड़ी भराते हुए, उन्हंे उछालते हुए, तड़पाते हुए उनका ताजा-तरीन माँस खाना और भेड़ों को बिना मारे उनकी आंतें खींचना! कितना आनन्ददायी था भेड़ियों के लिए!! लम्बे समय से अभी तलक भेड़ियांे के आतंक का साम्राज्य है उस बुग्याल पर।

नंद किशोर हटवाल जी के इस संग्रह की एक और कहानी है ‘मेरा भुला‘। यह कहानी तो संवादात्मक लहज़े में असरदार बन पड़ी है। इससे अधिक असरदार इस कहानी की कथावस्तु भी है। कथ्य तो और भी प्रभावशाली है। कथाकार ने पहाड़ और पहाड़ के बाशिंदों का देस में जाकर रहने के बाद आचार-व्यवहार में बदल जाने को बेहद गहराई से कहानी में शामिल किया है। बदलते समाज ने पहाड़ की पहाड़ियत को भी नहीं बख़्शा। पहाड़ में रहे-बसे कैसे मैदान में,राजधानियों में और शहरों में जाकर बदल जाते हैं और अपनों के साथ अजनबियों सा व्यवहार करते हैं। यह बेहद संवेदना के साथ और मार्मिकता के साथ कहानी में शामिल हुआ है। हर दूसरा बतौर पाठक इस कहानी को पढते समय इस कहानी के किसी न किसी पात्र में अपना वज़ूद देख सकता है।

आप भी इस कहानी के कुछ संवाद पढ़िएगा-

‘मगर मां के लिए बम्बई, कलकत्ता, दिल्ली, मद्रास, चण्डीगढ़ और देहरादून सब का मतलब सिर्फ ‘देश’ ही होता है।‘

‘सफलता पाकर जैसे वर्षों से शोधरत वैज्ञानिक खुश होता है उससे कहीं ज्यादा खुशी मां के मन में उमड़ी और उस पर काबू पाने के लिए मां कुछ देर मौन हो गई।‘

साम घिर आयी। मिसेज कैलखुरा ने पर्दे की ओट से देखा, किसनू कुर्सी से चिपका है।

‘‘यह आदमी कौन है?’’ उसने मिस्टर कैलखुरा से पूछा।
‘‘ऐं, कौन? वह अभी यहीं बैठा हुआ है?’’ कैलखुरा अचंभित हुए।
‘‘जरा पूछो तो ठीक से। दो बड़े झोले भी लाया है। कहीं तुम्हारे गांव-वांव का ही होगा।’’
कैलखुरा जा कर किसनू के पास बैठ गए।
‘‘कहां से आये बताया?’’ कैलखुरा ने पूछा।
द्वींग गांव से। मेरा मामाकोट क्वोटी है। मैं आपका...मतलब आप मेरे मामा हैं...।’’
‘‘अच्छा-अच्छा ठीक है। नौकरी के चक्कर में आए होंगे!’’ कैलखुरा भावशून्य चेहरे से बोले।
‘‘हां, मां ने कहा कि तेरे मामा...।’’
‘‘यह तो ठीक है, पर भई जब जगह होगी तभी तो कोशिस करेंगे। एप्लीकेशन दे देना।’’
‘‘हां...आं...। मां ने यह दिया है थोड़ा सामोंण।’’
‘‘कोई बात नहीं, कोई बात नहीं। भई इसकी क्या जरूरत थी। देखो भई नौकरी की हम पूरी कोशिस करेंगे।...पता करते रहना। हां...आं...यह बड़ा भरी झोला है! देखो भई हम तो पूरी ट्राई करेंगे।...ओफ्फ! दूसरा झोला उससे भी ज्यादा भारी है...! क्या है इनमें?’’
बिना किसनू का उत्तर सुने कैलखुरा ने नौकर को आवाज दी। नौकर दोनो झोलों को घसीट कर अंदर ले गया और आवाज बना कर पुकारने लगा, ‘‘कबाड़ी वाला, रद्दी वाला! टूटे डिब्बे, खाली बोतल, प्लास्टिक जूते!’’ बच्चे जोर जोर से हंसने लगे, ‘‘परसों वाली पिक्चर में पागल के पास यही झोला था। कहां से लाया चोरी करके?’’
मिसेज कैलखुरा अपनी हंसी पर काबू पाकर जब तक नौकर को झोले में रखे हुए सामन को बाहर निकालने का निर्देश देतीं, उससे पहले ही बच्चों ने झोले के एक छेद से बाहर निकल रहे एक ‘सामान’ को जोर लगा कर खींचा। इस प्रयास में झोला फट गया और सामन खुद-ब-खुद बिखर गया फर्श पर।
कैलखुरा ने किसनू से पूछा, ‘‘खाना-वाना ही खाकर जाओगे अब?’’
‘‘आं...हां...हां...नहीं...हां...हां...।’’
‘‘नहीं? क्यों?’’
‘‘हां हां खाना...खा...।’’
‘‘हूं..आं...’’ करते हुए पुनः अन्दर चले गए कैलखुरा।
किसनू ने हल्ले से अनुमान लगाया कि अंदर सिर्फ दो बच्चे हैं और दो औरतें आपस में बातें कर रही हैं। ...लड़की शायद यहां नहीं है इनकी...।

नौकर किसनू के लिए खाना लाया और कुछ देर बाद बिछाने के लिए कुछ कपड़े ले आया। किसनू झटपट गहरी नींद में डूबकर सपनो में खो गया।...उसके मामा-मामी और उनके बच्चे उसके इर्द-गिर्द बैठे हैं। मामा किसनू पर नाराज हैं कि इतना बड़ा हो गया पर आज तक यहां क्यों नहीं आया। मामी की आंखें नम हैं, तूने क्या हालत बना रखी है अपनी। पूछ रही है मामी-तेरी मां की कैसी हालत है? दोनो बच्चे किसनू की गोद में बैठे हैं। जिद कर रहे हैं, पापा-मम्मी भैया को यहीं रखो। मत जाने दो। सभी बार-बार मां के बारे में पूछ रहे हैं। पिता के बारे में पूछ रहे हैं कि उनको क्या हुआ था? कैसे गुजर गए थे? और फिर आ गई बुद्धी की ब्वारी...जिद कर रही है-किसनू आज हमारे यहां चलेगा...और मामी कह रही है यहीं रहेगा...।

संग्रह की कहानी ‘रतन को बालिग होने की बधाईयां’ पहाड़ की विद्रुपता को सहजता से रेखांकित करती है। कथाकार ने इसे मजबूरी और हताशा और पहाड़ का रोना नहीं बताया। वह सहजता से और दूसरे नज़रिए से पाठकों के सामने आती हैं। कहानी का प्रारम्भ आप भी पढ़िएगा -‘रतन अठारह साल का हो गया है। जीते जी बालिग हो गया। इस बीच वो मरा नहीं। खतरनाक पहाड़ी रास्तों से फिसल कर खाई में नहीं गिरा। वो न भीमल के पेड़ से गिरा कभी, जिन पेड़ों से चारा काटते-काटते उसका नाबालिगपन बीता। न इतने वर्षों में बाघ ने मारा उसको। न भूख उसका कुछ बिगाड़ पायी, न ठण्ड उखाड़ सकी। अठारह साल तक लगातार हर वर्ष बरसात में अपने गांव को आने-जाने वाले एक कच्चे पुल को आर-पार करता रहा पर कभी अलकनंदा में नहीं गिरा। इन अठारह वर्षों में उस पर कई बीमारियां आयीं। बिना डाक्टर और दवा के बीमारी जहां से आयी थी वहीं वापस चली गईं।‘ उत्तराखण्ड आंदोलन की पृष्ठभूमि के आस-पास का परिवेश देती यह कहानी पहाड़ और पहाड़ियों की आंखों में मेलों का उत्सव बताती है। कितनी अजीब बात है कि शांत वादियों ने भी कफ्र्यू देखा था! इस बहाने कहानी बताती है कि पहाड़ में कैसे मेलों में लड़के-लड़कियां पसंद किए जाते रहे हैं।

नन्द किशोर हटवाल की कहानियां लोक जीवन में झांकती है। पाठक को लगता है कि वह उसी परिवेश में पहुंच गया है। वह मानो वहीं रहता है जहां उनकी कहानियों के पात्र रहते हैं। यही उनकी कहानियों की खूबियां हैं। वह सहजता से पाठकों को सीधे वहीं ले जाती हैं जहां उन कहानियों का ताना-बाना बुना गया है। कहानियों में इतनी सामथ्र्य है कि एक-एक पात्र का रेखाचित्र पाठकों के सामने बनता चला जाता है।

इस कहानी में तो कथाकार ने एक साथ मेला और कफ्र्यू को सामने लाकर खड़ा कर दिया। आप भी पढ़िएगा-‘मेले में जलेबी खाते, कफ्र्यू में भूखे रहते। मेले में भीड़ होती कफ्र्यू में भीड़ क्या एक आदमी भी नहीं होता। ऐसा लगता कि आधी रात में एकाएक दिन हो गया हो! कफ्र्यू में वर्दी वाले भूत-मसाण साफ-साफ दिखने लगते घूमते हुए। मेले में जगह-जगह सुनाई देती हैं चूड़ियों-पोंछियों, हाँसुली-धागुलियों की खनखनाहटें। मिलने और बिछुड़ने की सिसकियां। बाजों और बच्चों की चिल्ल-पों। बाँॅसुरी पर बगड्वाली-पन्वाँणियों की मीठी धुने। रात में झुमैले-चांफलों के मीठे स्वर और कफ्र्यू में-भारी भरकम बूटों की धम्म धम्म, बन्दूकों की आवाजें और घर के अन्दर तक दिल को चीरने वाली गालियाँ। नया जमाना यही लेकर आ रहा था। मेले खत्म...कफ्र्यू शुरू...।’ पहाड़ की बाध्यताओं और मंज़र को लेकर पोथियां की जरूरत ही कहां है! इस कहानी का यह एक अनुच्छेद ही काफी है। आप भी पढ़िएगा-

‘...मुजफ्फरनगर में जो नौजवान मरे क्या वो बिना माँ के थे? उन माँओं ने भी तो भेजा उनको मुजफ्फरनगर! मैं एक दिन भी अपने बच्चे को नहीं छोड़ सकती? भूख से रोयेगा ही तो! सभी रो रहे हैं भूख से और रोज ही रो रहे हैं। रोते ही रहेंगे हमेशा यदि हम ऐसे ही भोले बने रहे। 

पार्वती दादी जिद करके गई थी रैली में। सब ना-ना कह रहे थे बुढ़िया को। पर बुढ़िया ने कहा कि मैं मर भी जाऊँ तो कौन आफत आने वाली है। मेरे नाती-नातेंण सब हैं। आन्दोलन में जरूर जाना। हमारे बच्चों को भी हमारी तरह दिन काटने पडे़ तो थुक्क है हमारे जीवन पर। मेरा बुड्ढा लाम पर गया और वहीं मरा। मेरा भुला भी लाम पर मरा। उसकी विधवा ने अपने लड़के को फौज में भर्ती करने से साफ मना कर दिया तो वो बकर्वाला बना। बकरियाँ बुग्याल ले जा रहा था तो एक बकरा रास्ते में झुण्ड से अलग हो गया। उसी को झुण्ड में मिलाने के लिए भाग रहा था। पहाड़ी से फिसला और चकनाचूर सीधे धौली में गिरा। लाश का पता तक न चला। मैं जीवित रही तो लहू के आँसू रोई हूँ। कहाँ लत्ते! कहाँ कपड़े! साम को खाने को नहीं होता मेरे पास। घर-घर मांगकर ये जित्तू पाला मैंने। एक साल की बात, अपनी बुलाक बेचकर एक भैंस खरीदी। सुन्दर ढप-ढपी भैंस थी। खूब छः-सात माणा दूध देती थी। मन में इच्छा थी कि जित्तू को पढ़ाऊँगी। लत्ते-कपड़े और फीस निकल जायेगी। ठीक माघ महीने की संगरान की बात है ये, उत्तरैण का परब था। ये जित्तू छै साल का था। बाघ ने छप्पऱ फाड़ कर दवाणे पर मारा भैंस को। थ्वोरी को भी नहीं छोड़ा।...मुझको तो काल भी नहीं खा सका! खा देता तो फिर चैदह करम किसके होते!...जित्तू के कारण ही मुझे भी जीवित रहना पड़ा। अब मेरे नाती-नातेण भी हो गये तो...।’

यह कहानी आरंभ तो राज्य आंदोलन के देशकाल से होती है। लेकिन समाप्त होती है राज्य के अठारह साल बाद राज्य के हालातों पर। आप भी पढ़िएगा- ‘और इसी राज्य में पलते हुए रतन अठारह साल का हो गया है। वो जीवित है। अविकसित, बीमार, कमजोर मगर जीवित। बिना दूध के पला-बढ़ा रतन बिना शिक्षकों के स्कूल में पढ़ा है। बिना डाक्टरों के हास्पिटल में इलाज हुआ है उसका...बिना दवा के। रोज ही टूटे-फिसलनभरे रास्तों से आता जाता है। इन अठारह वर्षों में उसने देखा कि ये पहाड़ और बड़े होते जा रहे हैं, और दुर्गम और कठिन होते जा रहे हैं। चढ़ाईयां और खड़ी हो गई हैं, घाटियां गहरा गई हैं। कई आपदाएं देख ली उसने। बाढ़, भूस्खल, भूकम्प देखे। लगातार खाली हो रहे गांवों, बंजर हो रहे खेतों को देख रहा है। पानी और जवानी का लगातार बहना और पहाड़ों के काम न आना देख रहा है। पहाड़ों का लुटना और बिकना देख रहा है। खनन और माफिया देख रहा है।

आगे कहां जाना है? क्या करना है? ये रतन को क्या, किसी को नहीं पता...लेकिन रतन की यह उपलब्धि भी कम बड़ी नहीं कि वो जीवित है। और आगे भी उसका लक्ष्य है कि वो जीवित रहेगा। 
रतन को उसके जीवित रहने पर ढेर सारी शुभकामनाएं और बालिग होने की बधाइयां!’

इस संग्रह में एक कहानी ‘गांव की पूजा‘ है। यह लीक से हटकर पाठकों के मन में पैठ बनाती है। गांव के सामने शहर को अलग ही अंदाज में खड़ा कर पाने में यह कहानी कामयाब हुई है। आप भी इस कहानी के कुछ विवरण पढ़िएगा-‘ गांव का वजन जितना कम हुआ शहर उतना ही फूलता गया। इधर गांव का कमजोर हो कर सिकुड़ना और उधर शहर की सूजन का नदी-नाले, खाई-खंदक, खेतों-जंगलों तक पसरना। गांव की नजरें बचाकर सुख सुविधाएं जितनी अधिक शहर के पेट में ठूंसी जाती उतना ही गांव लुढ़कता, लड़खड़ाता, खांसता शहर पर आ गिरता।

पूजा-आराधना का प्रभाव था कि बीमार गांव एक प्राचीन एवं पुरातात्विक महत्व के मंदिर में बदल गया। गांव के बचे-खुचे इंसान धीरे-धीरे प्राचीनकाल की दुर्लभ पवित्र मूर्ति बन कर इन मंदिरों में बैठ गये। मकान, रास्ते, स्कूल, खेत, नहरें, धार, जंगल और पन्देरे मंदिर के आसपास की पवित्र शिलाओं में तब्दील हो गये।

शहर में ग्राम निर्माण समितियों, ग्राम नवनिर्माण समितियों, ग्राम रक्षा मंचों, ग्राम संस्कृति प्रसार संगठनों का गठन हो गया। ये फण्डिग ऐजेन्सियों से फण्ड लेते और गांव से जुड़े तरह तरह के आयोजन करते। ग्राम संस्कृति का प्रसार और गांव के मूल्यों की रक्षा करते।’

यह कहानी बेहद सादगी से कथित सरकारी,गैर सरकारी संगठनों के छिपे मक़सदों पर गहराई से प्रकाश डालती है। सहायता प्राप्त यह कथित समितियों के पीछे खड़े महानुभवों के रेखाचित्र इस कहानी में सफलतापूर्वक खींचे गए हैं। इसी कहानी के और संवाद पढ़िएगा-

‘गांव के जयकारों से शहर गूंज उठता।‘
‘पिछले वर्ष फैंसी ड्रेस जो लड़की प्रथम आयी उसका नाम दिव्या है। उसने कभी गांव नहीं देखा। लेकिन गांव से अतिशय प्रेम। विदेश पढ़ी हुई। बेहद खूबसूरत...। वास्तव में दिव्या प्रथम पुरस्कार की योग्य हकदार थी। उसकी ड्रेस में पूरा गांव समाहित था। उसने लव्वा और आंगड़ा पहना था। सिर पर घुंघटी। नाक पर बुलाक और नथ। हाथों में पहुंची, पोटा। अधिकांश लोगों ने इस ड्रेस का पहले नाम तक नहीं सुना था।’

यह कहानी आगे चलकर तीव्रता से पलटती है। गांव छोड़कर जो शहर आए थे। शहरों में रहकर गांव को याद करते थे। अचानक शहर गांव में तब्दील हो गए। विकास के नाम पर कसे हुए व्यंग्य से भी पाठकों को यह कहानी मिलवाती है।

संग्रह में एक गंभीर कहानी है। बैल की जोड़ी। धैर्यवान पाठकों को यह जरूर पसंद आएगी। ऐसी कहानी जो लम्बे समय तक याद की जाएगी। ठेट गांव का अक्स इस कहानी में दिखाई देता है। 
आप भी पढ़िएगा इस कहानी के कुछ अंश -

‘दो महीने हो गये रज्जू को चट्टान से गिरे।...ये पहाड़ है माराज। चारों तरफ चट्टान, खाईयां, रपटे और घाटियां। समतल काँ मिलेगा चरने को।...क्या ढोर डंगर..क्या आदमी। पेट की खातिर चट्टान-खाईयों में तो जाना ही जाना है।...जवान था रज्जू अभी...पर आ गई काल घड़ी। इस बार बैल गिर कर चट्टान पर ऐसी जगह अटका कि देखने तक नहीं जा सका इंदरू। साम को सीधे गिद्द घूमते दिखे।‘

इंदरू हल लगाता है। उसके बैल की जोड़ी टूट गई है। टूटी क्या रज्जू बैल नहीं रहा। गज्जू बैल के बराबर का बैल उन्नीस दिन खोज करने के बाद मिला। इन उन्नीस दिनों में क्या-क्या नहीं देखा। कैसे-कैसे बैल नहीं देखे। पीठ बराबर नहीं रंग भी एक जैसा हो। सींग भी हों तो गज्जू की तरह। और भी बहुत कुछ। शानदार कहानी। शानदार संवाद। इंदरू का चरित्र-चित्रण करें तो बहुत सारी विशेषताएं सामने आएंगी। फिलहाल तो कुछ संवाद ही पढ़िएगा-

‘कहते....खेती किसाणी करने वालों पर काँ फबती है अकड़! शौक तो उन पर फबते हैं जो मिट्टी में हाथ नयीं डालते।...हल लगाते समय हलिया का तो सिर नीचा रैता है हमेशा..तो नीचा ही रैणा चायिये।...हम तो मिट्टी के आदमी हुये..मिट्टी की तरों ही रैणा खपता।...खेत तबि तैयार होंगे जब सिर नीचा रखेंगे! सिर उठायेगा तो गिरेंगे..नाक टूटेगी। हमारी तो चार दिन की फ्वीं-फ्वां होती। एक बैल चट्टान-घाटी में लुड़का नयीं कि फूक सरक जायेगी। जवानी के चार दिन के फुंफ्याट हैं ये! रोब-दाब...शौक-शाक...इधर खेती किसाणी में काँ चलते।..ठसक तो राज्जा-माराज्जों के होते..पूरी जिंनगी निभाणे की ताकत जिनपे है!!‘

‘‘कीमत क्या होणी..!..पर मेरे को पसंद नयीं आया माराज।’’ इंदरू ने भी लोगों को ही जवाब दिया। 
‘‘क्यों?’’ बकील ने पूछा।
‘‘असली चीज तो हैं ही नयी उसपे!’’ इंदरू ने कहा।
‘‘असली चीज माने?’’ आँह! बकील जिरै करने लग गया। ठिक बणा देगा इंदरू को।
‘‘सिंग!’’
‘‘सिंग? असली चीज तो हलिया है...कि बैल कैसा हल लगाता है?’’
‘‘वो तो है। सिंग बि जरूड़ी हैं। सिंग शान होती हैं बैल की। बैल का अच्छा हलिया होणा अपणी जगा पे ठीक है।’’ इंदरू ने कहा।
बकील घचपचा गया।..दिखणे में तो हलिया से भी गया बीता लगता है..पर...! इंदरू का हाथ जोड़ कर जी जी न कहना और ऐसे अपनी बात को कहना बकील को बड़ा नागवार गुजरा। हलिया दर्जे का आदमी, बैल का खरीदार ऐसे बात करे..। बकील को कमजोरी महसूस होने लगी और असंतुलित हो गया।
‘‘तुम लोग सिंगों से तो नयी लगाते हल?’’ 
‘‘अब सिंगों से तो क्या लगाणा...पर ...मेरे को पसंद नयीं हैं बिना सींग का बैल।’’ 
..येई ऽ ऽ ऽ! हलिया की भी पसंद-नापसंद..! अकड़ देखो इसकी! खरीदने आया है बैल...और बातें...?
‘‘तुम थ्वोकदार हो!’’ 
इंदरू ‘थ्वोकदार’ पर हंसा, ‘‘अरे थ्वोकदार-थूकदार काँ मराज। मैं तो घरी में रैता, ख्येत्ती किसाणी करता हूं।’’
‘‘..हमने सोचा तुम लंदन-अमरिका रैते..।’’
‘‘हा! हा!! हा!!!’’ सभी हंसे। वे इंदरू के लंदन-अमेरिका न रहने और घर में ही रहने पर हंसे तो इंदरू उनकी हंसी पर हंसा। 
‘‘नयी माराज, तुमने गलत सोचा। मैं लंदन-अमरिका कयीं नयी रैता। गाँव में यी रैता हूँ। ख्येत्ती-किसाणी करता हूँ...हलिया आदमी हूँ।’’ 
...हल्या नयीं जिला जज होगा जैसे! हल्या आदमी दोनो हाथ जोड़कर, सर झुका कर बात न करे तो भद्दा तो लगता ही है। ..शर्मिन्दा होकर बात करणी चाहिए कि....खेती किसानी का धंधा करने के लिये मैं शर्मिन्दा हूँ..। आपके सामने नतमस्तक हूँ कि आप मिट्टी में हाथ नयीं डालते..। यही तो सनातन से होता चला आया है...। पर ये साला सनातनी परम्परा को तोड़ रहा...घंतर आदमी..! 
‘‘खैर पसंद तो अपणी-अपणी हुयी पर.....देशों में तो कुछ बैलों के सींग ही नयी होते?’’ पंचम ने संभाला।
‘‘अब सींग नयी होते, वो अलग बात है..पर ये तो सींग वाले बैल होते हैं ना।’’
‘‘हल सींगों से लगाते या नसेड़े से?’’ बकील ने कहा।
‘‘हा! हा!! हा!!!’’ पंचम ने दाद दी। 
इंदरू ने कहा, ‘‘देखो माराज, मेरे को बिना सींग के बैल नयीं पसंद हैं तो नयीं हैं। बैल के सींग टूटणे का क्या मतलब है? या तो वो लड़ाख्या है और या...क्या...बोलते..मतलब...चालू टैप का है..।...बाकी उसके सींग क्यों टूटेंगे?...बैल लड़ता क्यों है? किस चीज के लिए लड़ता है? बोलो! वो बिधैक यमपी है?’’
लोग हंसे। बकील जिरह के लिए कुछ सोच रहा था।

एक और असरदार संवाद पढ़िएगा-
‘‘अपणे डण्डे वाले मालिक को दिखाणे के लिए कि मैंने दूसरे का बैल मार दिया। अंकार मालिक का...शांत करे बैल..। जो बैल ऐसे लड़ता है वो मूरख है।....वो खाली इसलिए लड़ता कि उसे सींग मिले हैं।..मूरख बैल को ये पता ही नयीं चलता कि सींग तेरी शान है भायी! अर तेरी शान मालिक की शान!...मालिक की शान तेरी शान नयीं..। बैल का सींग टूटा है माने वो लड़ाख्या है और बैल का लड़ाख्या होना अच्छा नयीं होता! सींग टूटा मतलब..उसकी भावना अच्छी नयीं...सुभाव अच्छा नयीं। सिंग हैं मतलब वो ‘राज्जा’ है। लड़ाई वाला राज्जा नयीं! बिना लड़ाई के राज्जा बणो तब बात है ना! ही! ही! बकील साब! अच्छा स्यम्न्या! मैं चलता हूं।....भौत सुणा दिया!!’’
‘‘भात बण गया, खा के जावो!’’ पंचम बोला।...एक बार और कोसिश करके देखणे में कोई हरज नयीं..।
‘‘हाँ ठीक कै रे हैं ये।’’ सिब सिंग ने कहा।
‘‘नयीं नयीं चल्ते हैं।’’ कहते हुए इंदरू ने सिब सिंग को ‘चल्ल’ कहा और मूनाकोट की तरफ निकल पड़ा।

इसे भी पढ़िएगा-
‘‘...बण्ड से बैल खरीदणे..?..आया होगा..। आया था भौत पैले..।...हां मैंने मना कर दिया था।...बण्ड्वालों को मैंने कब्बि नयीं बेचे बैल। वे बूढ़े बैलों को जंगल रप्टा देते हैं।..वाँ उनको बाग मार देता है या वे चट्टान-खाई-खंदकों में गिर जाते हैं।...ये गल्त बात है।...और फिर उनके याँ तलाऊ जमीन हैं। दस-दस बारा-बारा दिनों तक लगातार रोपाई में जुते रहेंगे बैल...एक दिन का भी आराम नयीं देते बैलों को..।..एकी जोड़ी बीस-बीस दिनो तक जुती रैती..! दूसरी जोड़ी नयी करेंगे...। मैंने तो देखे हाल हैं उनके..।’’
‘‘...और तुमने उस आदमी से पूछा था कि कितनी जमीन है? उसने अस्सी नाली बताई तो तुमने का कि मेरे बैल पचास नाली से जादा हल नहीं लगा पायेंगे..। फिर तुमने पूछा कि तुम क्या करते हो? उस आदमी ने का कि नौकरी। तुमने का कि मैं नौकरी वालों को नहीं बेचता अपने बैल।...जो आदमी खुद मालिक और खुद हलिया हो उसी को बेचूँगा...।’’
एक यह भी संवाद है-
‘‘वो मेरे मामा थे ...और साथ में मैं था।..पैछाणा?.’’ बच्चू पदान हंसा, ‘‘मामा ने भौत खुशामद की तुमारी..। मुहमांगी कीमत देने को तैयार थे..। उनको नौकरी पर जाणा था..दूसरे दिन..। पर तुमने साफ मना कर दिया...कि बण्ड्वालों को तो देन्नायी नयीं। तुम बण्ड्वालों से भौत चिढ़े थे।..उस टैम तुमारे पास दो-दो जोड़ी बैल थे..।...और अबि तुम मेरे बैल का पूरा हुलिया ले रे हैं?..खरीदते टैम बि तुमी लेंगे हुलिया और बेचते टैम बि तुमी..। खरीदते टैम बि तुमारी चलेगी अर बेचते टैम बि तुमारी। ये अच्छी रयी!!’’
‘‘अरे मराज तुम बि पूछ लो..। ले लो हुलिया। कयीं पर कोई ऐतराज हो तो ना कर देणा।....मैं तो राज्जा बणा के रखता बैलों को ’’
‘‘क्यों पूछो? अगर मैंने बैल बेच दिया..तुमसे पैंसे ले लिए तो...फिर मुझे बैल से मतलब?..तुम कुछ करें बैल के साथ..इससे मतलब?’’
‘‘अरे माराज तुम राशन थोड़ी बेच रे..? आखिर जीबन बेच रे हैं.!’’
‘‘जीबन बेच रे का क्या मतलब होता है? फालतू बात लगा रे।’’
‘‘देखो पदान जी..मुझे कैणा नयी चायिये था पर कैणा पड़ रा है..। तुमारे गाँव वाले पैले बेटियों के पैंसे खाते थे..। वो बि बेचणा ही हुआ एक परकार से..। बेटी बेचते टैम घर-परिवार देखते थे कि नयीं?.उसके सुख-दुख का हुलिया लेते थे कि नयीं?..या बेच दिया तो तब कोई मतलब नयी?...कोयी कोऽछ करे..!’’

संग्रह में ’साझा मकान’ भी है। यह पहाड़ में आने वाली आपदाओं का सच्चा बयान है। कहानी का प्रभाव कुछ वाक्यों को पढ़कर महसूस किया जा सकता है-

‘रामकृष्ण चिलम पर लम्बी कश खींचते हैं। धुएँ का गुबार निकालते हैं और उस मकान की ओर फेंकते हैं।...काश कि ये मकान ढक जाय, ...गायब हो जाय इस धुएं में..। पलभर उनकी आंखों के सामने घूमता है धुआँ। भूकम्प से दरके उस मकान को क्षणभर ढक देता है। पर जल्दी ही गायब हो जाता है।‘

कहानी का एक और अंश पढ़िएगा-
‘पिछले साल बाढ़ भूस्खलन से भीषण तबाही हुई। पूरे गमणी गांव के चारों ओर दरारें पड़ी। जगह-जगह जमीन दरकी, धंसी और पूरा गमणी गांव नीचे खिसकने लगा तो नौटियालों के साझा मकान की क्या पूछ! मकान के चैक की दीवार टूटी। चैक दरका और मकान के टूटने का खतरा मंडराने लगा। रामकृष्ण नौटियाल अपनी आंखों के सामने अपने बाप-दादों की बनायी इस मकान के बुरे हाल नहीं देख सके। उन्होंने सभी भाइयों को चिट्ठी लिखी कि हमारे साझे मकान को खतरा है। आप लोग घर आओ या इसकी मरम्मत के सम्बन्ध में अपने विचार लिखो। रामकृष्ण सोच रहे थे कि सभी भाई-बन्धु उन्हें चिट्ठी लिखेंगे कि तुम मरम्मत कर दो लेकिन किसी की भी चिट्ठी नहीं आयी और न कोई घर पहुंचा। रामकृष्ण ने अपने दोनों लड़कों को लिखा पर लड़की  ने भी साझा मकान की मरम्मत की अनिच्छा जतायी। लड़़कों ने

साफ-साफ लिखा कि ये मकान सिर्फ हमारा तो है नहीं। दस परिवारों का है। सभी मिलकर चैक की दीवार बनाने को तैयार हो जांय तो हमें कोई आपत्ति नहीं।‘
लेकिन दस परिवारों को एक चैक की दीवार बनाने के लिये तैयार करवा पाना कोई सीधा काम नहीं था। रामकृष्ण ने एक-एक चिट्ठी और लिखी। तब जाकर कुछों का जबाब आया। पर जबाब भी कैसा? किसी ने लिखा था-हमें जरूरत नहीं है। किसी ने लिखा था-हमारे पास इस समय पैंसा नहीं। किसी ने लिखा था-तुम करवा दो। जितना खर्चा आयेगा उसमे हम अपना हिस्सा दे देंगे। किसी की चिट्ठी आयी कि हमारे दोनो बच्चे कान्वेन्ट में पढ़ते है, खर्चा ज्यादा होता है, आदि-आदि। पर एक बात जो सबने लिखी थी कि इस समय हम किसी भी हालत में घर नहीं आ सकते।‘
पुरखों का साझा मकान अब दस परिवारों के हिस्से में हैं। आपदा के बाद जब राहत की घोषणा हुई तो आठ देश में रह रहे परिवार भी राहत लेने आ गए। बीस हजार और दस टिनों का भी हिस्सा हुआ। लेकिन कहानी के भावनात्मक संवादों में यह संवाद आपके लिए भी है। आप भी पढ़िएगा-

‘इस बीच न जाने कब रामकृष्ण की पत्नी उस साझा मकान की नक्काशीदार खोली की ड्यल्ठ्येली (देहरी) में आकर बैठ गई और संगराम सिंह के साथ ही बड़बड़ाने लगी, ‘‘भूकम्प के बाद मैणा आयी थी। कह रह थी कि हम ध्याणियों (ब्याही गई बेटियां) का तो मैत ही उजड़ गया। इस तिबारी में बैठकर खूब रोई। कह रही थी अब क्या मैत रहा।...आधा मैत तो ब्वै-बबा के साथ चले जाता है। ...बाकी जो वचा वो भूकम्प ले गया...। जहां बचपन गुजरा, भाई बहिनों के साथ खेले, जहां हमने मां के हाथ की रोटी खायी....। जाते-जाते इनसे कह गई कि ददा इस कूड़ी (मकान) को जरूर बनाना...। ये भी सोचना कि ये साझा मकान तुम चालीस जनों के कुटुम्ब की अठारह ध्याणियों का मैत (मायका) भी तो है...।’’

रामकृष्ण फिर से एक बार और चिलम पर लम्बी कश खींचते हैं। धुएँ का गुबार निकालते हैं और उस मकान की ओर फेंकते हैं।’

‘कबट‘ इस संग्रह की एक और शानदार कहानी है। कबट बताना चाहती है कि हमारे लोक विश्वासों में अंधविश्वास, रूढ़ियां इतनी गहरी हैं कि कोई शिक्षित उसे तोड़ने के स्वर उठाता है तो वे पोंगापंथियों के शोर में दब जाता है। मैं आज तक समझ नहीं पाया हूं कि कोई अकेला, बूढ़ा, विधवा, वंचित ही पर कथित टोने-टोटके और कथित जादुई असर की करामात के आरोप लगाए जाते हैं?

इस कहानी के अंश आप भी पढ़िएगा-
‘गोविन्दू ने माल्टा काट कर अनूप के मुँह में निचोड़ा।
द्यौबा की ब्वारी गहरे तनाव में डूबी बड़बडा़ने लगी, “इस दुनिया में किसी का भरोसा नहीं...। जिसको अपना समझते हैं, वही दुस्मन हो जाते हैं।” तनाव गुस्से में बदला और स्वर तेज होता गया, ”तो देख लिया तुमने अपनी बौड़ी की करतूत? ये मिला तुमको जिनगी भर उसकी ढाड फोड़ कर। उसी दिन मरने देते उसको! जिस दिन उसको बिस्तर में गू-मूत हो गया था।...तब तो ड्वल्लेे में बिठा कर ले गये अस्पताल! पाँच दिन के गू के खाँतड़े धोये मैंने! अर आज ये मिला हमको? निपूती! निर्जड़ी!! औती ढोकरी। तू भली होती तो अपना मालिक खाती तू आते ही!...अर गिच्ची देख कर कौन कहेगा कि ऐसी है? अब समझना भी क्या था कि ये कबट खिला देगी। हम तो अनूप को जाने ही नहीं देते इस ढोकरी के पास! बोलने को तो दादी हुई पर...। ढोकरी, तूने ये भी नही सोचा कि मैं तो इन्हीं के यहाँ पल रही हूँ! वक्त-बेवक्त हमीं पुर्या रहे थे लत्ता-श्यौर। क्या नहीं कर रहे थे तेरे लिये?’’

माल्टे से अनूप का जी कुछ हल्का हुआ तो आशीष और गोविन्दू ने उसे बैठा कर क्वाद पिलाया। जाते समय आशीष ने कहा, “घण्टे-डेढ़ घण्टे बाद इसको खाना खिला देना। और उल्टी-सुल्टी बात मन में मत लावो, वो औंस...छंछर....कबट...घात वाली बात...।”

द्यौबा की ब्वारी ने द्यौबा से कहा, “जरा सद्या कर आवो तो इनको। आज औंस-छंछर की रात है। बयाल....बेत्ताल का डर!”
लेकिन द्यौबा के उठने से पहले ही आशीष और गोविन्दू निकल गए। ‘

एक और अंश पढ़िएगा-

“एई! अकेले ही चले गये वे....इस आशीष को भी कोई ग्यान नहीं!’’
“बड़े-बड़ों को नहीं होता ग्यान। आशीष और गोविन्दू की तो उमर ही क्या है! अर वैसे तो उमर कम भी क्या है! पर इस जमाने में खाली लिख-पढ़ है! पर ग्यान नहीं!”
’’गोविन्दू कैसे सिखाता होगा लड़कों को! मास्टर बना है, उस आशीष ने इसकी भी कुबुद्धि कर दी। हम अनपढ, हमें सिखाना था इन्होंने! पर इनकी ऐसी दुर्बुद्धि हो गयी है।”
साम को जब कभी भी ऐसा होता है तो सुबह अपने आप ही ठीक हो जाता है अनूप। ऐसा चार-पाँच महीने से हो रहा है। कभी ठीक-ठाक रहता है। कभी बहुत उल्टी-सुल्टी बातें करने लगता है।

यह भी -
पर अनूप तो दिन भर ठीक रहता है और साम को वैसा ही हो जाता है।
’’ना ना! ये कुछ और लगा है इस पर! कुछ भयंकर ही लगा है! जो गणत-पूछ में भी परकट नहीं हो रहा।’’
आशीष ने कहा, “ददा, इसको कोई दिमाग की प्राब्लम्ब है। किसी डाक्टर-वाक्टर को दिखा दो।“
द्यौबा ने सोचा, ये बेचारा भी भले के लिये ही कह रहा है अपनी तरफ से। अपनी तरफ से लगा हुआ है। पर अब ग्यान नहीं है तो इसकी भी क्या गलती!
द्यौबा की ब्वारी ने सोचा, पेट पिड़ा नहीं, मुण्ड पिड़ा नहीं, खाँसी नहीं, खुर्रा नहीं। खा रहा है, पी रहा है। डाक्टर के पास अपना सिर दिखायेंगे हम? क्या बताएंगे डाक्टर को?
पर कुछ कहा नहीं आशीष से। कहेंगे तो अपनी पिड़-पिड़ी करने लगता है।
आशीष को गुस्सा आ गया, “क्या कहा मैंने? मैंने कहा कोई दिमागी परेशानी है इसको। जब ये ठीक रहता है तो इसको जरा ढंग से पूछो। इसके साथियों से इसके बारे में पूछो। और किसी साइक्लोजिस्ट को दिखाओ....। मतलब दिमाग...मन वाले डाक्टर को....।“
द्यौबा और द्यौबा की ब्वारी को आशीष का गुस्सा अच्छा लगा। कितनी चिन्ता में है वो भी। अपने भाई-बन्धु.....पिरेमी, जानकार ऐसे ही गुस्सा दिखा कर अच्छा रास्ता बनाते है...अब ये अपने मन से तो अच्छा ही रास्ता बता रहा है हमको...पर...!

‘पुत्र प्राप्ति’ नन्द किशोर हटवाल जी के इस संग्रह में एक और कहानी है। ऐसी तमाम कहानियां हैं जो बताती हैं कि किसी भी घर में यदि पहली दो लड़कियां हैं और उसके बाद यदि पुत्र है तो वह परिवार वंशवाद के मोह में जकड़ा हुआ है। लेकिन हटवाल जी की कहानी में कहन शानदा है। तरीका और उसकी प्रस्तुति पठनीय है। अंतस तक पैठ बनाती है। आप भी नींचे अलग-अलग अंशों को पढ़िएगा-

‘योगेश्वर के घर तीन लड़कियों के बाद एक लड़का जन्मा। योगेश्वर को लगा कि उनका जीवन सार्थक हो गया। वे चार आदमियों के बीच उठने-बैठने के काबिल हो गये। लड़कियों के बोझ एवं लड़कों की उपयोगिताओं पर हो रही चर्चा में वे भी भाग ले सकते हैं। अब वे भी कह सकते हैं कि गोविन्द राम के लड़के तो हैं नहीं, न जाने क्यों पैसा-पैसा जुटाने में लगा रहता है। लड़कियों की तो शादी हो गयी। अब क्या! उसे चल देना चाहिये धन-सम्पत्ति दान कर चारों धाम यात्रा पर। अब योगेश्वर को लगता है कि उनकी मकान बनाने की चिंता में कितना दम है। एक ही संतान है, होयेगा-खायेगा तो कल सिर ढकने के लिए एक छत की जरूरत उसको भी होगी। वो नौकरी करके हमको पालेगा बस। मकान-वकान की तरफ से तो निश्चिन्त रहेगा! और क्या!!‘

“हाँ वे कह रहे थे कि ये लड़की शुभ नहीं है।” योगेश्वर ने कहा। 
“अबके लड़का होना था, मगर लड़की हो गई।” पत्नी बोली, ‘‘पुत्र प्राप्ति का योग था, पर पुत्र स्थान में एक नीच ग्रह पड़ने से कह रहे थे कि बाधा उत्पन्न हुई।” 
“ज्योतिष का बड़ा ज्ञान है पण्डा जी को।’’ 
“हाँ-हाँ उनके पिताजी राजपुरोहित थे।” 
“आगे क्या कहा उन्होंने?” 
“वही...तुझसे भी तो कहा होगा!” योगेश्वर के चेहरे पर एक गूढ़ रेखा उभर आयी। 
“हाँ...मगर...” 
“मगर-वगर क्या! लड़की के ग्रह भी काफी कमजोर हैं। बता रहे थे कि वो तो अपने आप ही...।” “हाँ लक्षण मैं भी देख रही हूँ। उस दिन से दूध भी नहीं पिया।” 
”दवा मंगवाई थी?” 
“नहीं, किससे मंगवाती?”
योगेश्वर पत्नी के इस कार्य से संतुष्ट हुए। बिना शब्द खर्च किये उन्होंने जतलाया कि ठीक है कहाँ दवाई-ववाई के चक्कर में पड़ी हो। 
मातृत्व और पितृत्व इस बच्ची के पैदा होने के एक महीने बाद भी पैदा न हो सका। भावनाएँ और 
दया वहाँ सिर नहीं उठाती जहाँ इनकी कीमत मुँह माँगी मिलने की संभावना होती है।
डेढ़ महीना होते-होते बच्ची इस दुनिया को अलविदा बोल गयी। भूख से...बीमारी से...जीने के लक्षण नहीं थे...! या किसी और कारण से...! ये कोई नहीं जानता।

कई प्रकार की बातें होने लगी, “भई योगेश्वर ने बहुत प्रयास किया, ईश्वर सबकी सुनता है।” 
“हाँ-हाँ मानो तो भगवान, न मानो तो पत्थर।” 
“गंधारी गाँव के रतन बुड्डे की छः लड़कियाँ हुई, तब देवलक के पण्डित जी ने कहा कि बदरी-केदार यात्रा कर। उसके बाद उसके कुल पुरोहित ने भी ये-वो करवाया तो सातवाँ लड़का हुआ।” 
“मेरे अपने खुद के मामा की आठ लड़कियों के पीछे है एक लड़का।”
“मगर किस्मत भी होती है साहब! चक्की वालों ने क्या कम प्रयास किये। पर कहाँ हुए लड़के?” 
“अजी साहब सब पूर्व जन्में के करम लगते हैं।” 
“गोविन्द राम जैसे देवता आदमी के लड़के न हुए तो क्या कहा जाय।” 
“हाँ-हाँ उस सज्जन आदमी की तो कोई सन्तान ही नहीं जन्मी।” 
जो आदमी खबर लाया था उसने कहा, “मैं उधर से आ रहा था तो योगेश्वर के चेहरे पर मैंने एक रौनक देखी। मैं फटाक समझ गया जरूर कोई खुशी की बात है। मैंने पूछा तो बताया कि लड़का हुआ है। वैसे मुझे पहले से ही विश्वास था कि अबके लड़का ही होगा।” 
“मैं भी तो एक दिन इनसे कह रहा था कि इस बार योगेश्वर का लड़का ही होगा।” 
इसके बाद चला क्रम बधाई देने का। योगेश्वर के धैर्य की प्रशंसा करने का। योगेश्वर की खुशी स्वयं की खुशी बताने का। किराये के मकान और मास्टरगिरी के पैसों ने भी नामकरण समारोह की भव्यता में कमी नहीं आने दी। नाम गौरव रखा गया। 
कई किस्म की शीशियां पहले-पहल घर में आने लगीं। टीके लगाये गये। कई ड्राॅप पिलायी गयी। कई किस्म के पाउडर के डिब्बे खाली हुए। खिलौने जमा होने लगे और एक के बाद एक कीमती कपड़े छोटे पड़ने लगे। 
बिस्कुट आते, फल आते, विटामिन की गोलियाँ आती, टाॅनिक आते। 
पाल्य पौधे में डली खाद से इर्द-गिर्द की घस-फूस भी खूब लहक उठती है। गौरव की आड़ में लड़कियाँ भी पोषकता पाकर खिलने लगीं। माँ का ध्यान लड़कियोें को मारने-पीटने, गाली-गलौच के बजाय गौरव के पोषण पर केन्द्रित हो गया। 

अभी बेटियां इस लायख नहीं हुई कि ये समझें, गौरव भाई है और ये उसकी बहनें। माँ-बापों पर भार है, पराया धन है, माँ-बाप को क्या देना है इन्होने, बल्कि सब लेना ही है। जिन्दगी भर का दुःख और दे जायेंगी। ससुराल में कुछ ऐसा-वैसा हुआ तो फिर उसी भाई के सहारे जीवन काटना है। पहले तो शादी के लिए लड़का मिलना ही बहुत मुश्किल, दान-दहेज तो बाद की बात है। माँ-बाप का तो उसी लड़के के सहारे जीवन है। और फिर चिता पर आग देने के लिए कोई और थोडे़ ही आयेगा। 
वक्त की बेआवाज दौड़। 
सुलेखा, दीपा और गीता एक के बाद एक कक्षाएँ फांदती गयी। घर का काम-काज भी किया, अपने लक्ष्य भी बनाये और उसकी तरफ बढ़ते गये।

कहानी यह बताने में चूकती नहीं कि पुत्र मोह किस हद तक सारी संभावनाओं को उलट कर रख देता है।

इस अंश को पढ़िएगा-
पत्र के नीचे लिखा था- माताजी को प्रणाम कह देना। 
बांई तरफ बारीक अक्षरों में लिखा था- माता जी ने मेरी एक फोटो और छुपा रखी है वो भी इसी आदमी को दे देना। पुलिस को घर में कोई सुराग नहीं मिलना चाहिए। 
योगेश्वर को लगा कि उनके बेटे ने उनके लिए जीते जी चिता तैयार कर उसमें अग्नि दे दी!
इस संगह में एक और कहानी है। कहानी का नाम है- राम जी की लीला। यह कहानी पाठक को खूब हंसाती है। रामलीला कमेटी और रामलीला मात्र आस्था का प्रतीक ही नहीं है, रामलीला से भी राजनीति की जा सकती है। यह भी कि रामलीला में भी राजनीति होती है। यह दिलचस्प कहानी बन पड़ी है। कुछ अंश आप भी पढ़िएगा-
हवलदार ने अध्यक्ष को पैग बनाने को कहा और खुद तैयार होने लगा। अध्यक्ष हरिप्रसाद पैग बनाते हुए कहने लगा कि कोई बात नहीं हवलदार जी, इसकी क्या जरूरत थी। नंदा माई कसम! तुम सोच रहे होंगे कि ये साला इसीलिए आया यहां। पर मैं सही बताऊँ कि मुझे इससे कोई मतलब नहीं रहता। मिला तो पीता हूं, नहीं मिला तो नहीं पीता हूं। 
फिर पैगों को गडकते हुए कहने लगा हरिप्रसाद कि चलो थोड़ी सी ले लेते हैं। नहीं तो तुम भी नाराज होंगे। अरे भई! हम लोग भी तो आपी लोगों की बदौलत ये चीज देखते हैं। नहीं तो यहां सूखा-पट्ट है। वो कच्ची तो साली मैं लेता ही नहीं...वगैरा...वगैरा...।
और हवलदार अपने कपड़ों को निकाल-निकाल कर पूछने लगा कि अध्यक्ष जी कौन सी शर्ट सही रहेगी स्टेज के लिये। पैंन्ट कौन सी चलेगी ये या ये? मफलर इस तरह गले में लगाऊँ या इस तरह? मूछें ज्यादा लम्बी तो नहीं लग रही? स्टेज के लिये काले जुराब सही रहते या सफेद? वैसे मेरे पास लाल जुराब भी हैं। एक बात बताओ, टाई पहन सकते हैं या नहीं? आदि आदि।
हरिप्रसाद और हवलदार लड़खड़ाते कदमों से रामलीला स्थल पर पहुंचे। रामलीला देखने अपार भीड़ उमड़ी थी।

“हौलदार जी! अब आज की लीला के बारे में बता दीजिये।’’ पर्दे के अंदर से तबला मास्टर फुसफुसाये। हवलदार चढ़ पड़ा तबला मास्टर पर, ’’अरे पैले पब्लिक का वैल्कम तो करने का ना...कोई मेनर होता है कि ऐसे ही फालेन हो जावो! वैसे आज की स्टोरी सबको पता होगी ही, ये यहां पे बतलाना इम्पोर्टेन्ट है?’’
’’सूत्रधार तो कार्यक्रम के बारे में ही बताता है। ये बैलकम-फैलकम सब पड़धान जी करेंगे।...चले आये सू़त्रधार बनने...।” मंगल सिंह बोला।
’’रामलीला में पड़धान-फड़धान इज नथिंग। इधर सब रामलीला मण्डली का अध्यक्ष...आल टोटल यानि एवरीथिंग होता है।’’ हवलदार गुस्से में बोला।
’’आज की लीला की थीम बता दे भई हवलदार।’’ भगवान सिंह का आदेश मिला हवलदार को। 
’’राइट! तो हम आज की थीम बता देते है। थीम मिन्स स्टोरी। नो मेन्सन...।’’
मूछों को ऐंठते हुए हवलदार फिर जनता की तरफ घूमा, ’’हमें आर्डर हुआ है कि हम आपको आज की रामलीला के बारे में बतायेंगे। आप लोग शायद जानते ही होंगे कि राजा दशरथ, जो कि रामचन्द्र के फादर थे यानि पिताजी थे, बड़े भारी किंग थे यानि राजा थे। उनके पास बहुत बड़ी पावर थी यानि आर्मी फोर्स। उनपे कुछ ऐसा एम्नेशन था एण्ड आम्र्स थ...एम्नेशन जानते है ? है! है!! आप लोग सिवलियन है, एम्नेशन के बारे में नहीं जानते एण्ड आजकल के आम्र्स के बारे में तो तुममें से कोई थोड़ा भी नहीं जानता होगा। हमको तो सब ट्रेनिंग दी जाती है। वो फिर कभी टैम से बताऊॅंगा...तो हां, उनके फोर्स को देख कर राक्षसों की जो कण्ट्री थी, जो गौरमेण्ट थी, घबड़ाने लगी...।’’
’’मगर हौलदार जी, अब आज के कार्यक्रम के बारे में बता दीजिये। टैम ओवर हो रहा है।’’ भगवान सिंह थोड़ा परेशान हुआ।

उस रामलीला में स्टेज पर किसी भी देवता की झाँकी निकलती थी तो मृदुलानन्द शास्त्री की राय के अनुसार आरती की थाली हरेन्द्र ही घुमाता था। उसके बाद स्टेज में ही भगवान के सम्मुख कई देर तक दण्डवत् की मुद्रा में लेटा रहता था। उस रामलीला में हरेन्द्र ने रावण, हनुमान, अंगद और परशुराम जैसे महत्वपूर्ण पाठों को गाॅव के योग्य कलाकारों को न देकर अपने आदमियों को दिलवाया था। राम, लक्ष्मण और सीता के पाठ खेलने वाले बच्चों के माॅ-बापोें से हरेन्द्र ये कहता फिरता था, ”भाई बड़े जोड़-तोड़ से आपके लड़के को राम का पाठ दिलवाया, वरना हारमोनियम मास्टर तो साफ मना कर रहा था। मैने उससे कहा कि ये तो अध्यक्ष के हाथ की बात है कि किसको काहे का पाठ दे और एक बात आप किसी से न कहना, भगवान सिंह भी नहीं चाहता था कि तुम्हारा लडका राम बने। तभी देख रहे हंै न उस दिन से कैसा झकझका पड़ा है। जलन हो गयी है उसे।“

”देखो आपके लड़के की आवाज कितनी सटीक बैठ रही है। हारमोनियम मास्टर भी बड़ा खुश है इससे। फिर भी कुछ ‘लोग’ कह रहे थे कि नहीं, सीता के लिए ये फिट नहीं। पता नहीं ‘ये लोग’ इतनी ईष्र्या क्यों करते तुमसे।“

हरेन्द्र पात्रों से भी व्यक्तिगत रूप से मिलता और कहता, ‘‘हां सुन भुला मंगल सिंह, रावण का पाठ तू ही खेलेगा। अब कोई ट्राई नहीं होगी। मैंने साफ कह दिया कि खेलेगा तो मंगल सिंह, नहीं खेलेगा तो मंगल सिंह। अरे भुला जब तुम लोगों की कृपा से मैं मण्डली का अध्यक्ष बन ही गया हूॅं तो अब तुम्हारे वास्ते कुछ तो करना पड़ेगा ना मुझे!’’

‘‘हां बेटा! तू चिन्ता मत कर कि तुझ से चैपाय नहीं गायी जा रही है। अरे प्रोज से ही काम चला लंेगे। भाई, जब तुम लोगों ने मुझे अध्यक्ष बनाया है और मुझे कोई एतराज नहीं तुम्हारे पाठ खेलने पर तो भगवान सिंह कौन होता है एतराज करने वाला? और फिर कौन से बम्बई में दिखानी है हमको रामलीला। अपने गांव की लीला ही तो है! किसी एक का ठेका थोडे़ ही है अंगद का पाठ खेलने का। औरों को भी तो मौका मिलना चाहिए, वो कलाकार हो या न हो।’’

‘‘भैजी! हनुमान का पाठ आप ही खेलेंगे। सीधी सी बात है, जो जिस पाठ के लिए फिट बैठता हो उसी को मिलना चाहिए वो पाठ। ऐरे-गैरों को दे देते है पाठ। रामलीला हो रही, कोई मजाक नहीं। कल लोगों के सामने नाक थोडे़ ही कटानी है गांव की। एक चैपाई तक नहीं गा सकते और पाठ चाहिए। कुछ लोगोें के मुंह से मैंने ऐसी भी बात सुनी कि जब सब नये कलाकार आ रहे हैं तो हनुमान वाला भी नया रखो। पर आप छोड़ना मत। मैं अध्यक्ष हूं आपके आर्शीवाद से और मेरी इतनी भी शउर नहीं कि मैं हनुमान का पाठ आपसे न हटने दूं?’’

रामलीला के तुरन्त बाद प्रधान के चुनाव होने वाले थे। अपनी पूर्व योजनानुसार हरेन्द्र भी उठा। लोगों ने उसके छद्म एहसान का बदला उसे वोट देकर चुकाया और वर्षो से प्रधान पद को लालची भेड़िये की नजरों से देख लार टपकाने वाला हरेन्द्र बन गया प्रधान। जिस हरेन्द्र के नाम से गांव का बच्चा भी घृणा करता था उसने अपने निकटतम प्रतिद्वन्दी भगवान सिंह की जमानत तक जब्त करवा दी थी । 
रामलीला में अपनी छवि सुधार के साथ-साथ हरेन्द्र ने जो भगवान सिंह की इज्जत मिट्टी में मिलाने का भी अभियान छेड़ा था उसमें भी हरेन्द्र काफी सफल रहा। 

हरेन्द्र जानता था कि पिये हुए हवलदार को छेड़ा जाय तो वह खुद ही बखेड़ा खड़ा कर देगा। भगवान का खासमखास आदमी और दंगा कर रहा है! सांप भी मरे! लाठी भी न टूटे!
लेकिन पिये हुए हवलदार को छेडे़गा कौन? इसका साहस पिया हुआ मंगल सिंह ही कर सकता है। ठीक है, राजू को स्पेशल तार देकर इसीलिये तो बुलाया है घर कि रम का पूरा कैरेट लेकर आना। लालपरी देखकर भगवान के गुर्गे तो क्या भगवान भी मेरे गुट में शामिल होकर रामलीला की ऐसी-तैसी कर दे!

बवाल को शान्त कर भगवान सिंह स्टेज के एक ओर लगी अपनी बैंच पर बैठा पर्दा खुलने का इन्तजार कर ही रहा था कि हरी प्रसाद घबड़ाया सा आया और भगवान के कान में कुछ कहा। भगवान सिंह सीनरी रूम की तरफ भागा। स्टेज पर रावण दरबार का सीन होना था पर सीन घर में न रावण का मुकुट था और न सफेद रेपदार पैजामा। सीनरी मास्टर परताप बक्से पर ताला ठोक कर न जाने कहां गायब हो गया था।

‘‘परताप मंगल सिंह को पकड़ कर ले गया था उधर। न जाने दोनांे कहां गायब हो गये?‘‘
‘‘उसे बुला कर लाओ।’’
‘‘तब तक बहुत देर हो जायेगी।’’
‘‘आज तो सुबह चार बजे से पहले शुरू नहीं होगी रामलीला।’’
‘‘चार बजे तक रहेगा कौन? लोग अभी उठने लगे हैं।’’
‘‘चल भाई रमेश, ऐसा करो कि विश्वामित्र के साथ राम-लक्ष्मण वाली सीन करो।’’
‘‘लेकिन विश्वामित्र की दाढ़ी भी उसी बक्से में है।’’
‘‘ओ चल, छोड़ दाढ़ी-वाड़ी। अब तो गांव की इज्जत का सवाल हो गया। लोग उठ जायेंगे तो हमारी बेइज्जती हो जायेगी।’’ भगवान सिंह बेबस हालत में बोला।
‘‘पर बिना दाढ़ी के लोग हंसेंगे मुझ पर। परताप आता ही होगा। तब तक किसी को बोलो कि मंच पर चढ़ जाये और कोई कार्यक्रम दिखाये।’’
‘‘खाली मंच लोग ज्यादा देर बरदाश्त नहीं करेंगे, अव्यवस्था फैल जायेगी।’’
‘‘मंच खाली रखने के लिये नहीं बना है। जनता मंच पर चढ़ा हुआ देखना चाहती है किसी को, वरना...’’कुल मिलाकर अपने पाठकों को श्री हटवाल जी कहानियों के माध्यम से उत्तराखण्ड की लोक,कला,संस्कृति,जीवन, रहन-सहन, आचार-व्यवहार के दर्शन सहजता से करा देते हैं। वह भी इस कौशल के साथ कि वह यात्रा सी लगे और कहानी की खूबियों के साथ लगे। यह ढब ही उनकी ताकत है। और ताकतवर कहानियां पाठक को बेचैन किए रखती हैं।

लेखक चर्चित कहानीकार हैं 

9412158688, 7579111144

चैनल माउन्टेन, मीडिया के क्षेत्र मैं काम करने वाली एक अग्रणी एवं स्वायत्त संस्था है . जो की पिछले 21 सालों से सतत कार्यरत है.

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