एक लपांग

गीतेश सिंह नेगी

सुमधुर गीतों और संवेदनशील कविताओं का संग्रह है ’एक लपाग’.

संदीप रावत नई पीढ़ी में गढ़वाली साहित्य के ऐसे सक्रिय लेखक हैं जो गद्य और पद्य दोनों मे समान रूप से लिख रहे हैं. गढ़वाली साहित्य में संदीप रावत जी की पहली कृति है. एक लपागष जो कि छन्द मुक्त कविताओं, क्षणिकाओं और गीतों का एक सुन्दर संग्रह है. समय साक्ष्य देहरादून से सन 2013 में प्रकाशित 80 पन्नों के इस संग्रह का सुन्दर मुखपृष्ठ उत्तराखण्ड के ख्याति प्राप्त चित्रकार बी. मोहन गी और अमृतराज सिंह ने बनाया है और इसकी भूमिका गढ़वाली साहित्य के जाने माने सम्पादक कवि और रंगकर्मी मदन मोहन डुकलाण जी ने लिखी है. संदीप रावत सरल, मिलनसार स्वभाव सुरीले सुर के एक संवेदनशील और कवि हृदय व्यक्ति हैं. उनकी मेरि ब्वै कविता में वही खुद और मार्मिकता महसूस होती है जो उर्दू अर हिन्दी के प्रसिद्ध शायर मुनव्वर राना की माँ के शेरों में महसूस होती है.

ज्याळु दिखै एबाटू बतैं एजैंन मी तैं हिटणू सिखै,
घोळ बिटी अगास तक एजैंन मी तैं उड़णू सिखै,
सैंति पाळि मनखी बणै एजैंन मी तैं हैंसणू सिखै,
वा हौरि क्वी ना मेरि ब्वे छै।
मेरि ब्वे.

रावत जी की रचनाओं में जहां एक तरफ मानवीय संवेदना की अभिव्यक्ति, भ्रष्टाचार, बेइमानी और चकडै़ती व्यवस्था के खिलाफ रोष, उत्तराखण्ड आंदोलन राज्य गठन के बाद के नाकामी हालातों पर रोष एंव गांव, पहाड़ तथा समाज की समस्याएं दिखती हैं तो वहीं दूसरी तरफ पहाड़ के हक़, हकूक की बात भी बेबाकी से रखी गई साफ नजर आती है.

हमारा सुपिन्या, 
कुर्च्येणा छन,
जल, जंगल, जमीन का पुश्तैनी हक,
हमुसे लुच्छ्येणा छन।
उत्तराखण्ड बणिगे.

उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के लम्बे संघर्ष के बाद अलग राज्य बना तो सही परन्तु निरकुंश राजनीति, नौकरशाही और ठेकादरों की चारों तरफ मचीं लूट और छूट से जो उल्टे हालात पैदा हुए उसके बारे में  संदीप रावत लिखते हैं.

जौन ना कबि खैरी खैए ना क्वी तड़तड़ी उकाळ सै,
ना भूखा तीसा रै एना कबि भूखा तीसों कि सुद्याळ कै,
ना लड़ि कबि हैंका हक़.हकूक की लड़ै,
आज वी छप्येणा छन अखबारों मा।

’एक लपाग’ की ज्यादातर क्षणिकाएं जोरदार और प्रभावशाली ढंग से कम शब्दों मा गहरी बात व्यक्त करने की क्षमताएं रखती हैं.

खेती, पाति, ढ़ंगार
कूड़ी हुयीं, खंद्वार
ई छ अब
म्यारा गौं कि अन्वार ! बग्ग्त बग्त की बात छ दगड्यो,
बग्त बग्त की बात छ,
जै गौं मा मनखी लागौंन्दा छा धाद
आज वू !
मनख्यों लगौणू धाद छ, 
बग्त बग्त की बात छ। 

संदीप जी कलम के साथ - साथ कंठ के भी धनी हैं. इस संग्रह में 'बसन्त ऐग्ये, ढौळ कनु भलु विकास होणु' जैसे और भी सुन्दर व मधुर गीत हैं जिनको कविता मंचो पर भी श्रोताओं की खूब वाह वाही मिली है। ’एक लपाग’ के गीत प्रकृति चित्रण और संरक्षण पलायन से उपजे मार्मिक और नैराश्य हालातों, जीवन दर्शन व राजनैतिक कुव्यवस्था से पैदा हुए हालातों की सफल अभिव्यक्ति करते हैं। इस पुस्तक के गीतों से संदीप रावत के एक अच्छे व सशक्त गीतकार होने की सम्भावना बहुत अच्छी तरह उजागर हुयी है. ’एक लपाग’ केवल एक काव्य संग्रह मात्र नहीं है बल्कि इस काव्य विधा से गढ़वाली साहित्य संसार में संदीप रावत जैसे एक संवेदनशील और समर्पित लेखक का पदार्पण हुआ पद्य से शुरू हुए इस सफर के बाद रावत जी गढ़वाली गद्य में भी लगातार खूब लिख रहे हैं और गढ़वाळि भाषा साहित्य कि विकास जात्रा जैसे ऐतिहासिक और संग्रहणीय ग्रन्थ एंव लोक का बाना के बाद गढ़वाली कथा संग्रह 'उदरोल' प्रकाशित हो चुका है। गढ़वाली साहित्य की सृजन यात्रा में संदीप रावत ऐसे ही एक लपाग यानि विश्वास भरे डग भरते हुए लगातार सृजन पथ पर आगे बढ़ते रहेंगे और आने वाले समय में जरूर गढ़वाली साहित्य का भण्डार भरने वाले और श्रृंगार करने वाले ख्यातिलब्ध व एक प्रतिष्ठित साहित्यकार के रूप में जाने जाएगें. इसी आशा और मंगल कामनाओं के साथ.

 

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