नंदा की चिंता-3

महावीर सिंह जगवान 

नंदा और नैना आज अधिक प्रसन्न लग रही हैं, इसके पीछे जो असल कारण था वह नैना का मैदान मे रहने से यह मानसिकता बन गई थी.

पहाड़ी गरीब अनपढ और अज्ञानी होते हैं वह अपने को सुपीरियर मान रही थी और नंदा को थोड़ा कमतर, गलती तो नैना की भी न थी, मैदान की हवा और दिखावट बनावट का प्रभाव था। नंदा भले ही छोटी है लेकिन हर क्षेत्र मे नैना से इक्कीस ही है। नैना जो कल तक सोच रही थी गरीब के घर पर आ रखी हूँ आज उसे गर्व हो रहा है वह उस महान ब्यक्ति की नातिन के साथ है जो धरती पर देवता से कतई कम न था। दूसरी नंदा सब कुछ जान रही है उसे भी अपने दादा जी पर गर्व है और नैना की सहज स्वीकारोक्ति से उसे आत्मबल और खुशी मिली है।

सुबह के पौने चार बज रहे हैं, नंदा का परिवार उठ चुका है, सभी ताँबे के तीन लीटर डिब्बे की टोंटी से पानी निकाल रहे हैं और पी रहे हैं, नैना उठना न चाहकर भी उठना पड़ रहा है, नंदा एक गिलास पर उसे भी पानी देती है, नैना मना करती है लेकिन वह कहती है जरूरी पीना है और वह मान जाती है, पानी पीकर कमरे से बाहर आते हैं और थोड़ा देर तक नंदा और नैना देहली पर बैठते हैं, नैना पूछती है, नंदा यह संगीत की आवाज कहाँ से आ रही है, नंदा का जबाब, सुबह उठने का पहला फायदा यही तो है, नाना प्रकार की पछियों का मधुर कलरव है यह, दादा जी कहते थे दो से पांच मिनट एकांत होकर यह संगीत सुनने से बुद्धि बढती है और दिवस भर कितनी भी असहजता हो सुकून बना रहता है। फिर उठकर नंदा नैना से पूछती है दीदी जी आप दाँत साफ दातून से करेंगी या ब्रश से, नंदा के घर पर ब्रश तक की ब्यवस्था है यह देखकर नैना भी चौंक गई, नंदा कहती है हम दातून से ही दाँत साफ करते हैं वह भी लगभग हर दिन अलग अलग, नैना बोलती है मैं समझी नहीं, नंदा समझाती है मेरे प्रिय दादाजी किसी वैद्य और डाॅक्टर से कतई कम नहीं थे, दादा जी कहते थे नीम तीन प्रकार के होते हैं, पहला नीम, दूसरा वकायन, तीसरा कड़ीपत्ता वाला पौधा, साथ ही टिमरू, आड़ू, बासिंगा, लकड़ी का कोयला इन सभी से हम दाँत साफ करने पर, दाँत मसूड़े तो स्वस्थ रहते हैं साथ ही जिह्वा की स्वाद ग्रन्थि और लीवर के लिये भी यह लाभ दायक है। इसलिये हम बारहमासा इनसे ही दाँत साफ करते हैं, जबकि मेहमान की जरूरत के हिसाब से हमारे यहाँ कोलगेट का पेस्ट और डाबर का लाल दन्त मंजन के साथ ब्रश का पैकेट रखा है लेकिन मेरे परिवार मे आज तक कोई इन सबका प्रयोग नहीं करता है,

नैना कहती है मेरे तीन दाँत भरवा रखे हैं मुझे भी अपने दाँतों की रक्षा करनी होगी, मै भी मम्मी पापा से यही मगाऊँगी, नंदा कहती है अब तो शहर वाले बाबा राम देव जी का मंजन प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन जितना कारगर हमारा नुस्खा है आज भी यह इक्कीस ही होगा। नैना बहुत खुश है उसे तो लगता है वह नई दुनियाँ मे पहुँच गई है, झट कर हाथ मुँह धुलकर सुबह की कलेऊ रोटी खाते हैं और दादी जी घर पर हैं बाकी सभी खेत मे जाते हैं, तीन बहिनें नंदा और माँ साथ में नैना आज इन्हें मिर्च की पौध लगानी है, नंदा की बड़ी दीदी चालीस लीटर पानी भरा गैलन और एक लोठा लेकर खेत में पहुँचती है, नंदा की दूसरी दीदी लाइन से खड्डे बना रही है, नंदा प्रत्येक खड्डे मे अपनी अंजुली से गोबर डाल रही है और नैना नंदा की माँ द्वारा लाई गई पौध को पकड़कर प्रत्येक खड्डे मे रख रही है, फिर नंदा की माँ आकर प्रत्येक खड्डे मे तरीके से पौध लगा रही है, पीछे नंदा की बड़ी दीदी प्रत्येक पौधे मे एक लोठा पानी डाल रही है, दो घंटे मे दो सौ से अधिक पौध लग चुकी हैं, प्रत्येक खेत मे बीस फीसदी बंजर है जिसमे या तो घास बोई रहती है या स्वयं उग जाती है, फिर नंदा की माँ तर बड़ी दीदी इन छोरों से एक एक गठरी घास लेकर आती हैं, बीच वाली दीदी खाली गैलन और लोठा, बाकी नंदा और नैना टहलती हुई घर आती हैं सुबह के अभी साढे आठ बज रहे हैं, घर में नंदा की दादी गाय को दुह चुकी है और दो लीटर और चार लीटर के डिब्बे में दूध रखा है,

तभी नंदा की माँ दूसरे खेत से तीन कद्दू, पाँच लौंकीऔर आड़ू तोड़कर लाती है, घर की जरूरत की सब्जी और दो लीटर दूध घर पर छोड़कर बाकी चार लीटर दूध और सब्जी आड़ू को ढंग से पैक कर, गाँव की गाड़ी तक छोड़ने चली जाती है। नैना उत्सुकता से सब कुछ देख रही है, नंदा, नैना की नजरों और भाव को पैनी निगाह से देख रही है। नैना पूछती है नंदा, बड़ी माँ यह सब लेकर कहाँ गई, नंदा कहती है यह हमारे घर का जरूरत से अधिक उत्पाद है, इस अतिरिक्त उत्पाद को गाड़ी वाला नजदीकी बाजार ले जाता है, उसे माता जी महीने मे आठ सौ रूपये देती है और वह बाजार मे माता जी द्वारा चयनित दुकानदार को सामान देता है, हर पंद्रह दिन मे माता जी बाजार जाकर उनसे सामान के रूपये ले लेती है, पिछले साल माता जी ने अस्सी हजार रूपये अपनी मेहनत से बचाये थे। यह तरीका सब कुछ मेरे दादा जी ने सिखा रखा है। मेरे दादा जी कहते थे, पहाड़ पर रहने वाले लोंगो को मौसम और सुरक्षा को मध्यनजर रखते हुये सायं को जल्दी विश्राम और सुबह जल्दी उठना चाहिये। घर के पारंपरिक बीजों को बचाकर रखना चाहिये। कोई भी सब्जी फल और अन्न जरूरत से अधिक उगाना चाहिये, इससे आप अतिरिक्त उत्पाद को बेचकर आय प्राप्त कर सकते हैं, यह आय आपकी मेहनत का पुरस्कार है यह तुम्हें खुशी खुशी मेहनत करने को उकसायेगा और जरूरत पड़ने पर आपकी स्वाभिमान के साथ रक्षा करेगा। नैना हर बार दादाजी की नई विशेषताऔं से रूबरू होकर कौतूहलता से प्रसन्न हो रही थी।

आज नैना, नंदा से कहती है किताबों मे गाँव के बारे मे सुना है लेकिन गाँव और खेतखलिहान से अब रूबरू हो रही हूँ, यह मेरा सौभाग्य है, आज मै नंदा के पूरे गाँव को देखूँगी, नंदा कहती है माँ आती होगी तब तक बड़ी दीदी से पूछ लेते हैं फिर माँ से पूछकर चले जायेंगे। नैना कहती है ऐसा क्यों, नंदा कहती है यहाँ सबकुछ नियम से चलता है, दीदी डिग्री काॅलेज मे पढती है, माँ घर मे रहती है, दोनो के अनुभव और सलाह से निर्णय लेकर ही हम दिनभर की कार्ययोजना बनाते हैं यदि पिताजी घर पर होते तो पिताजी की सलाह भी अनिवार्य है, यह नियम भी दादा जी का बनाया है, सबसे बड़ी बात जब भी हम दादाजी के बनाये नियम का पालन करते हैं तो हमे उसमे सौ फीसदी कामयाबी मिलती है, साथ ही लगता है दादाजी का आर्शीवाद हमारे साथ है यही हमारी सबसे बड़ी पूँजी है। थोड़ी ही देर में नंदा की माँ भी आ जाती है, फिर नंदा कहती है माँ जी आज नैना के साथ गाँव घूमना है, माँ इजाजत देती है, साथ ही कहती है बड़ी दीदी से सलाह करके ही जाना, नैना तर नंदा बड़ी दीदी के पास जाते हैं, थोड़ा शख्त मिजाज की बड़ी दीदी दोनो के पहुँचते ही बैठने के लिये कहती है, दोनो चुपके से बैठ जाते हैं, बड़ी दीदी कहती कहिये क्या फरमाइस है, नंदा दबी जबान मे कहती है, नैना गाँव घूमने की जिद्द कर रही है आपकी आज्ञा और मार्गनिर्देशन चाहिये। बड़ी दीदी हाँ बोलती है और कहती है बीच वाले जिन रास्तों पर आम के पेड़ हैं उनसे होकर ही जाना, वहाँ से जंगल खेत गाँव नदियाँ सब दिख जायेंगी, तुम दोनो को डेढ घंटे की छुट्टी है, सावधानी से जाना और समय पर पहुँच जाना।

जी दीदी जी कहकर आँगन से बाहर निकलती हैं और तितलियों की तरह उड़ने लगती हैं जैसे ही आँगन से कुछ दूरी पर पहुँचते ही नैना भौचक्की रह जाती है, चंपा के श्वेत और कनेर के पीले फूलों से रास्ता ऐसा सजा है मानों स्वर्ग से परियाँ धरा पर उतरी हों, उनके अभिनंदन हेतु धरा के विनय पर चंपा और कनेर ने अपने यौवन सदृश आकर्षक पुष्पों को धरा पर उड़ेल दिया है। नैना पूछती है, नंदा यह कैंसे, नंदा मुस्कराते हुये कहती है, रास्ते के दोनो ओर ऊँचाई पर देखो चंपा और कनेर के पौधे हैं, नैना को ऐसा लग रहा था मानो नई दुनियाँ मे आ गई हो, कुछ आगे जाने पर वह देखती है विशालकाय आम के पौधे वह रोचकता से पूछती है नंदा क्या यह अपने आप हुये और क्या इनसे आम निकाले जाते हैं, नंदा बड़े प्यार से कहती है, हमारे गाँव के रास्तों पर सत्रह आम के पेड़ हैं जिनकी उम्र लगभग तीस साल से दो सौ साल के आस पास तक है। इनमे तीन पेड़ मेरे दादाजी के लगा रखे हैं और पाँच पेड़ गाँव के ही दूसरे दादा जी ने लगाये हैं, बाकी सब पुराने हैं, हाँ इनसे कई कण्डी आम निकलता है, इनमे पाँच पेड़ का आम बहुत खट्टा होता है जिसे सभी अचार बनाने के लिये निकालते हैं, बाकी सभी आम मीठे होते हैं, हम लोग घाटियों मे तरगर्म इलाके मे रहते हैं हमारे जो रिश्तेदार नातेदार ऊँची जगहों पर हैं जो पिछले महीने तक हमारे लिये काफल भेज रहे थे, साथ ही काष्ठ निर्मित कृषि यंत्र, रिंगाल की कण्डीऔर रिंगाल का झाड़ू भेजते हैं हमारे यहाँ से भी पके हुये मीठे आम, अचार, मक्का, भीमल की रस्सी उन जगहों पहुँचेगा, कुछ दूरी पर जाकर नैना पूछती है जंगल मे काले हरे लाल गुलाबी क्या दिख रहा है, नंदा कहती है करौंदा, किरमोड़, हीसर, घिंघारू है।

चलो चलकर इनका आनंद लेते हैं, दोनो दौड़कर जाती हैं और जमकर लुत्फ लेती हैं। नंदा कहती है दादाजी कहते थे हमारे जंगल मानव, जीव जन्तु पशु पच्छी कीट पतंग मधुमक्खी इन सबकी जरूरतों को पूरा करते हैं लेकिन आज का आदमी इतना लालची हो गया वह जंगल की चिंता ही नहीं करता, नैना कहती है क्या जंगल जरूरी है और यदि है तो हमारे शहर मे क्यों नहीं और गाँव मे ही क्यों जरूरी। नंदा कहती है दादाजी कहते थे जंगल गाँव मे जितना जरूरी है उससे दुगना शहर मे जरूरी है। गाँव मे जंगल होने से हवा शुद्ध होती है, पशुऔं को चारा मिलता है, वर्षा जल को वन अधिकता से अवशोषित करते हैं, वर्षा का पानी जो वनो से बहकर खेतों मे आता है वह खेतों की उर्वरा शक्ति बढाता है, वनो से जैविक ईधन भी मिलता है, हम जिस एलपीजी गैस या विजली के चूल्हे का प्रयोग करते हैं उनमे एलपीजी गैस के भण्डार सीमित हैं जबकि बिजली खर्चीली है यदि आधुनिक तकनीकी के चुल्हे बनाये जायें तो वनो से कटाई छटाई से प्राप्त तनो से वैकल्पिक ईधन प्राप्त हो सकता है। दादा जी कहते थे पहले यहाँ चीड़ के बहुत पौधे थे जब दादा जी छोटे थे तो उस समय बच्चों को गुड़ देकर चीड़ की छोटी छोटी पौध उखाड़वाई जाती थी। धीरे धीरे चीड़ कम हुआ और चौड़ी पत्ती वाले पौधे लगाये गये आज इस कम ऊँचाई वाले जंगल मे बाँज देवदार तक के पेड़ हैं.

वनो से प्राकृतिक जल श्रोतों के रिचार्ज होने की संभावना होती है, नंदा कहती है साल भर मे मात्र दो बार ही कुछ हफ्तों के लिये ही जंगल चारे के लिये खुलता है और प्रत्येक माह गाँव का प्रत्येक परिवार तीस रूपये जंगल की सुरक्षा पर ब्यय करता है। जो हमे स्वच्छ हवा और शुद्ध और मीठा जल मिल रहा है वह इसी वन की देन है, जब भी चारा कटाई के लिये वन खुलता है तो तीन शर्तें होती हैं, पहली छोटी पौध को बचाकर ही चारा काटें, दूसरा हरे पेड़ लकड़ी के लिये कोई नहीं काटेगा, तीसरा जो जितना काट कर स्वयं ले जा सकता है उतना ही एक दिन मे काटेगा, साल भर मे पचास बोझ चारा हर परिवार को जंगल से मिल जाता है। नैना कहती है क्या यह जंगल सरकार ने लगाया है, नंदा कहती है यदि सरकार ऐसे जंगल लगाती तो हम कहाँ कश्मीर से कम थे, नंदा सामने वाले रिजर्व फाॅरेस्ट को बताती है और कहती है, वह देखों चीड़ का वन सरकार हर बार वहाँ पौधे लगाती है और हर बार वहाँ आग लगती है, खूब मोटी चाँदी काट रहे हैं वन विभाग वाले, दादाजी कहते थे वह पहले हमारे बगल के गाँव का जंगल था लोगों ने खूब पाल पोस कर जंगल बनाया गया था लेकिन अब वन महकमे के कब्जे मे है। तब से लोंगो का लगाव भी खत्म हो गया, इस जंगल मे तीन प्राकृतिक जल श्रोत थे वह भी सूख चुके हैं, हर साल बड़े बड़े आयोजन होते हैं वृक्षारोपण से संबंधित और कागजों मे हजारों और जमीन पर विना जड़ के कुछ सैकड़ा पौध लगाकर खूब तालियाँ पीटी जाती हैं, अखबारों मे बरसात मे एक ही खबर पौध लगाई गई और बरसात से पहले अखबार भरे होतें हैं हजारों हेक्टेअर जंगल जलकर राख हो गये।

थोड़ा आगे बढते ही नैना पूछती है नंदा कोई खेत फसलों से लहलहा रहे हैं और कोई बंजर क्यों, नंदा मुस्कराकर कहती है वो ऊपर की ओर देख यह सुन्दर लकड़ी की नक्कासी से सजे घरों के दरवाजों पर देख, जो लटके हैं ताले उन पर पीपल उग आयें हैं, कहते हैं यह सब बड़े बन गये हैं, कोठी बंगला कार नौकर रखे हैं इनके शहरों मे, अब इन्हें अपनी मातृ भूमि से शर्म लगती है, दादाजी कहते थे यदि इनके बच्चे लायक बन गये तो यह सात समुद्र पार बस जायेंगे फिर इन्हे भारत माँ से भी मुहब्बत कम होगी और फिर फिरंगियों से शादी कर सदा के लिये खो जायेंगे। इन्ही के घर आँगन गाँव मे भूतहा बनकर डराते हैं और बंजर खेत आबाद खेतों की रौनक मे दाग की तरह दिखते हैं, नंदा कहती है दादा जी कहते थे यह सिलसिला एक बार बहुत बढेगा फिर नई शुरूआत होगी।

नैना को प्यास लगी है बस अब गाँव का वह श्रोत आने वाला है जिसकी हर तीज त्यौहार पर पूजा होती है, जब भी गाँव मे नवबधू का आगमन होता है तो इस प्राकृतिक अविरल बहने वाले धारे (नल) की पूजा होती है, यहाँ सर्दियों मे गर्म और गर्मी मे ठंडा पानी निकलता है, नंदा कहती है बस आना वाला है वह पावन जल श्रोत, लेकिन जैसी ही पहुँचते हैं वह पूर्णत: सूखा और बंजर पड़ा है फिर बगल वाली दीदी के घर से दोनो बहिने पानी माँगकर प्यास बुझाती हैं।नंदा दु:खी है वह जिस जल श्रोत की तारीफ करते हुये नहीं थक रही थी वह बंद देखकर मानो किसी ने उसके चेहरे की मुस्कराहट छीन ली, उसे दादा जी की याद आती है, नंदा नैना से कहती है दादाजी कहते थे, इन प्राकृतिक जल श्रोंतो की वजह से ही सदियों पहले गाँव बसे और यदि भविष्य मे यह सूखने लगे तो गाँवों पर बड़ा संकट आ जायेगा, नैना कहती है सरकारें तो हर गाँव मे स्वच्छ और पर्याप्त जल देने के लिये करोड़ों ब्यय कर रही है फिर चिंता क्यों, नंदा कहती है सरकार ने पहाड़ों के क्षेत्रफल से कई गुना अधिक पाइप और रूपया बहाया है लेकिन योजना बनने के बाद या तो पाइप ही गोल हो जाते हैं या बिना जल श्रोत के पाइप मे सिर्फ भ्रष्टाचार की ही हवा बहती है, नंदा थोड़ा गंभीर होकर कहती है, दादा जी कहते थे, उत्तर प्रदेश के जमाने मे थोड़ा भय और ईमानदारी थी, अब तो अपना ही राजा है और अपना ही वजीर खूब लूट रहे हैं पहाड़ियों को, एक भी नींव का पत्थर ऐसा नहीं रखा जो पहाड़ का वासी गर्व से अपने गाँव मे आत्मनिर्भर बन सके, उसकी तो तब स्खूल दूर थी लेकिन गुरूजी विद्यालय मे पूरे थे, अब नजदीक आई तो गुरूजी आधे से भी कम, दूर अस्पताल मे जाकर घीं का सेर देकर इलाज बढिया होता था अब तो घर घर अस्पताल मौत बाँट रहे हैं, गाँव के श्रमदान से बनी सड़क और रास्ते आज भी मुस्कराते हैं लेकिन प्रधान मंत्री सड़क योजना मे बनी सड़के एक बरसात मे ही जमीन से मिट जाती हैं, रास्ते पर चम चमाता काम उद्घघाटन की रात तक ही जीवित रहता है, नंदा कहती है मै तब हुई थी जब राज्य बने दस वर्ष गये थे, दादा जी कहते थे नंदा जब तू बड़ी होगी तुम्हें ही कुछ करना होगा, क्योंकि जो अभिवाहक बन बैंठे हैं राज्य का भाग्य विधाता बनकर वह तो निहायत डकैत और कामचोर हैं, इनसे तो आस दिखती नहीं, नई पीढी ही कुछ कर पायेगी, नंदा चिंतित है क्या बदलाव आयेगा।

नंदा की चिंता जारी क्रमश:।

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