ईश्वर की खोज

प्रेम बहुखंडी 

कल लोहड़ी के शुभ अवसर पर मैंने अपनी ईश्वर की खोज के लिये यात्रा शुरू की।

रात्रि पड़ाव ऋषियों की तप स्थली ऋषिकेश में किया। लिटिल बुद्धा कैफ़े में स्पेनिश खाना खाया, मन, आत्मा और पेट को आलौकिक शांति मिली। पिछले तीन वर्ष से लोकतंत्र के तथाकथित चौथे खम्बे के नीचे खड़ा रहकर, देश के सबसे ताकतवर पत्रकारों और पत्रकारिता की कुंठा और डर को महसूस किया। पूँछ दबाए खिसियाये शेरो की दुनिया से मुक्ति पाकर सचमुच आत्मिक सुख मिल रहा है। आज उत्तराखंड में उत्तरायणी और देश मे मकर संक्रांति का पर्व है। अभी तक होटल हर्मितेज के बिस्तर में ही हूँ, अगर ठंड ने इजाजत दी तो गंगा स्नान भी किया जाए। जय गंगे। बहराल, माँ गंगा ने ठंड से बचने की शक्ति दी, राहुल और अभिनव ने हिम्मत बढ़ाई और हमने माघ माह के पहले दिन, मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर ऋषिकेश के गंगा घाट में स्नान किया। हर हर गंगे।

ऋषिकेश में गंगा स्नान के पश्चात् ईश्वर का ध्यान किया, ईश्वर तो ध्यान में आये नहीं पर एक बात का अहसास हुआ कि 'धर्म और गन्दगी' का चोली दामन का साथ है, धर्म स्थल और उसके आसपास हरवक्त गन्दगी और अव्यवस्था का बोलबाला रहता है। लक्ष्मण झूला के पास होटलों की गन्दगी सीधे गंगा में गिर रही है। यात्रा के दूसरे चरण में गंगा की जन्मस्थली देवप्रयाग की तरफ को रवाना हुए। अच्छा लगा कि देवप्रयाग हर बार जैसा ही दिखता है। यहाँ पर पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन उत्तराखंड सरकार, यहाँ के नेताओं और मंत्री - संत्री के पास रिश्वत खाने के अलावा कुछ काम ही नहीं है, लिहाजा चंद लोग जो सदियों से यहाँ धार्मिक क्रिया कर्म के लिए आते हैं वही दिखाई दिए, सड़क पर गन्दगी, शौचालय की दुर्दशा, गंदे - बदबूदार होटल अपने धार्मिक स्थल होने की गवाही चिल्लाचिल्ला कर दे रहें हैं।

आज की यात्रा का मुख्य लक्ष्य ज्वाल्पा देवी की पूजा / दर्शन था, इसलिए बांगखेत के रास्ते सतपुली की तरफ चल दिए। सतपुली हमारे बचपन से भी पहले का प्रमुख स्थान हैं, यहाँ पर कुछ खास नहीं बदला। वहीँ गन्दगी, वहीँ गंदे होटल बचपन की याद दिला रहे थे, बस फर्क ये था कि पहले गन्दा नहीं लगता था अबकी बार लगभग 20 साल बाद गया तो थोड़ा गन्दगी का अहसास हुआ। लड़कियां और महिलाएं पहले की तरह की कुपोषण का शिकार नजर आ रही थी, चेहरे का नूर और ख़ुशी तो लगभग सबके चेहरे से गायब थी, हालाँकि कुपोषण और सूखे होंठों को छुपाने के लिए महिलाओं ने अबकी बार लिपस्टिक का सहारा लिया हुआ था, साड़ी की जगह सूट सलवार ने ले ली है। (अगर यही विकास है तो फिर वो तो दिखा).

सतपुली की नदी की मछलियां दुनिया में सबसे स्वादिष्ट होती हैं ऐसा अभी कुछ दिन पहले मेरे एक घुमक्कड़ और खावु किस्म के दोस्त ने दावा किया था, लेकिन जब यहाँ के होटल में मछली खाने पहुंचे तो वही नजीबाबाद की मछली मिली, ज्यादातर सब्ज़ी, मीट, मछली, मुर्गा, दूध, ब्रेड और अन्य रोजमर्रा की चीजे नजीबाबाद से ही आ रही हैं। सतपुली में हंस फाउंडेशन के भोला जी महाराज और माता मंगला जी ने बहुत शानदार अस्पताल खोला है, जो इनकी महानता को दर्शाता है और बाकि बाबाओं और महाराजों को आईना भी दिखा रहा है.

ज्वाल्पा देवी मंदिर में मुझ जैसे नास्तिक को भी आत्मिक शांति का अहसास हुआ। मंदिर सिर्फ दर्शनीय ही नहीं हैं बल्कि इसकी काफी मान्यता भी है, और सबसे अच्छी बात की साफ़ सुथरा है कोई पंडित या उनके दलाल आपके आगे पीछे भागते नहीं हैं। मंदिर में एक माताजी बैठी थी, एक 12 -13 साल बच्ची धार्मिक कार्यों में उनकी मदद कर रही थी. प्रसाद के नाम पर वही मीठे इलायची दाने और चावल के खील, उत्तराखंड के सारे मंदिरों में स्थानीयता पूरी तरह से नदारत है। मंदिर स्थानीय समुदाय के जीविकोपार्जन में कोई महत्वपूर्ण योगदान नहीं कर रहे हैं, इसके लिए कुछ हद तक सरकार और मंदिर का प्रबंधन भी जिम्मेवार हैं। मेरा मानना है कि उत्तराखंड का विकास मंदिर, पानी और शुद्ध हवा को केंद्र में रखकर किया जाना चाहिए। (आज यही ज्ञान मिला)

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