बुढ़ दीवाली - हरिबोधनी एकादशी

चंद्रशेखर तिवारी 

मुख्य दीपावली के ग्यारह दिन पश्चात पहाड़ खासकर कुमाऊं अंचल में बूढ़ी दीपावली (जिसे हरिबोधनी एकादशी भी कहते हैं) के पर्व का भी महत्वपूर्ण स्थान है।

इस दिन घर के अंदर से भुइँया निकाली जाती है। कुमाऊनी समाज में भुइँया को दुःख, दरिद्र व रोग शोक का प्रतीक माना गया है। भुइँया को गाँव के ओखल, सूप अथवा डलिया में गेरू व बिस्वार से चित्रित किया जाता है। सूप में चित्रित भुइँया को महिलाएं सुबह सबेरे घर के प्रत्येक कमरों से बाहर निकालती हुई आंगन तक लाती है। भुइयां निकालते समय खील बिखेरने के साथ ही रीखू (गन्ने) के डंडे से सूप को पीटा जाता है और " आओ लक्ष्मी बैठो नरैण...भागो भुइँया घर से बाहर " कहते हैं। सूप में रखे दाड़िम व अखरोट के दानों को आंगन में तोड़ा जाता है। साथ ही तुलसी के थान व ओखल में दिया जलाया जाता है। प्रकिया पूरी होने के बाद जब आंगन से घर के कमरों में प्रवेश करते हैं फिर "आओ लक्ष्मी बैठो नरैण " कहते हुए व खील बिखेरते हुए आते हैं।

फोटो सौजन्य : श्री विश्वम्भर नाथ साह 'सखा '

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